Thursday, July 9, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- आत्मग्लानि

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
   विधा - छंदमुक्त कविता 
 कविता - निर्वेद प्रधान रचना 
   शीर्षक  -  " आत्मग्लानि  "

भाव - रचनाकार प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि एक आदमी गलती तो करता है लेकिन अपनी गलतियों का अहसास होने के  पश्चात् कैसे आत्मग्लानि महसूस करता है। 
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समय था जब तक, मैं बना रहा अज्ञानी। 
हो रहा मुझे क्यों, अब आत्मग्लानि। 
मैं अहंकारी और मैं अभिमानी, 
हो रहा मुझे क्यों, अब आत्मग्लानि।।

सेवा कभी न, माँ-बाप का किया ।
बहनों को कभी न प्यार दिया।। 
पत्नि का कभी न सम्मान किया,
न भाई को सहयोग दिया।। 
याद आ रहा अब जहरीली जुबानी। 
हो रहा मुझे क्यों, अब आत्मग्लानि।। 

पाप के अहसास से, 
मन ही मन घेर रहा अंधेरा है। 
क्यों गिला शिकवा करूँ मैं किसी से, 
असली कुसुर भी तो मेरा है।। 
गंदी सोच से भरी पड़ी थी जवानी। 
हो रहा मुझे क्यों, अब आत्मग्लानि।।

नशा से हमेशा मैं धूत रहता, 
जानवरों सा मैं व्यवहार करता। 
बेबसी न दिखती बच्चों की, 
आँखों में सदा जो नमी रहता।। 
नशा ही नाश कर रहा मेरी हर कहानी। 
हो रहा मुझे क्यों, अब आत्मग्लानि।।

औरत की मर्यादा को भी मैं लाँघ गया।
जब मंगलसूत्र पे मेरा हाथ गया। 
रिश्ता वहीं तार-तार हो गया। 
प्यार मेरा ओ कहाँ खो गया।। 
खत्म हुआ सुहाग की भी निशानी। 
हो रहा मुझे क्यों, अब आत्मग्लानि।।

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