जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- मेरे गांव
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हे राम!
आओ कभी हमारे गांव,
स्वागत में आपकी,
बहारों ने फूल बिछाया है।
शबरी से लोगों ने,
पलकें बिछाया है।
नहीं रखें है शबरी से बेर,
हमने जंगलों से चुनकर।
रखे हैं चावल हमने,
जो खेतों में उगाया है।
है रास्ते जर्जर,
मिट्टी की पगडंडी बनवाया है।
आए कई, कई गए,
सबने राम राज्य लाने की,
हमें आस दिलाया है।
हे राम!
आओ कभी हमारे गांव,
दिखाऊंगा तुम्हें मेरी गांव की हालत।
अयोध्या सा महल नहीं,
मिट्टी का आसरा है।
शहर से कोसों दूर,
ये हमारा बसेरा है।
बड़ा सा पहाड़ है,
छोटी सी नदिया है।
केवट सा नाव नहीं,
खेती ही कमाई का जरिया है।
छोटी सी प्राथमिक शाला है,
माध्यमिक तीन कोस दूर है।
बड़ी दूर से आते बच्चे,
शाम नींदों से चूर है।
छोटी छोटी बातों को लेकर,
जाते हैं बड़ी दूर हम।
हे राम!
आओ कभी हमारे गांव,
घूमेंगे पूरी गांव हम।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने वर्तमान सरकार को राम मानकर उन्हें अपने गांव की स्थिति बता रहा है, साथ ही उनकी मदद से सुधार की आस लगाए हुए है।
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