Thursday, July 23, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना:- सफर

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
   शीर्षक  -  " अंतिम सफर"
     विधा - छंदमुक्त  
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तय कर रहा मैं एक लंबी सफर। 
क्यों नहीं अब मेरा कोई हमसफर। 
कल तक जो अपने होने का दिलाशा देते रहे, 
अब क्यों नहीं आते कोई नजर।। 
अंतिम सफर में आज मैंने माना है। 
आना भी अकेला और अकेला ही जाना है।। 

अब तक जो मेरे कंधों में रखकर, 
गोलियां अंधाधुंध चलाते रहे। 
आज वही कंधों पर क्यों, 
जनाजा मेरा घुमाते रहे।।
है मेरे दुख में शामिल ये, या सिर्फ एक बहाना है। 
या लोगों की नजरों में,अच्छा खुद को बतलाना है।। 

मतलबी है ये दुनिया, 
मतलब का ही संसार है। 
हैसियत थी जब तक मेरे पास, 
तब तक ही मददगार हैं। 
जीते जी तो कभी जीवित न समझा, 
अब मगरमच्छ के आँसू क्यों बहाना है। 
अब तो दिखावा बंद करो, 
अंतिम सफर पे मुझे जाना है।। 

काम न आते धन और दौलत,
कर्मों का ही होता तोल है।
सत्कर्म समागम कर ले अपने भीतर, 
जीवन उससे ही बनता अनमोल है। 
अंतिम यात्रा का ये नजराना है। 
जमीन के नीचे मेरा कब्रखाना है।। 

अपनों  का अपनापन खत्म, 
आँसू भी थम जायेगा। 
अंतिम सफर में कोई, 
अपना खून भी साथ न आयेगा। 
फिर शोक में क्यों घराना है। 
अंतिम सफर में ही तो जाना है।। 
     
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