स्थान-दुर्ग (छ.ग.)
विधा-सायली छंद
शीर्षक-नदी
*नदी*
पर्वत
हिम पिघलती
बनती धारा निर्झर
बहती चंचल
निर्मल
प्राकृतिक
सौंदर्य निखारती
धरा ऊपजाऊ बनाती
वायु शीतल
बहाती ।
सतत्
बहती नदियाँ
सीख हमें देती
चलता चल
अनवरत ।
थकना
नही कभी
थमना भी नहीं
कर्म कर
निरन्तर।
पावन
पवित्र धारा
चंचल चपल सरिता
चलती पथ
समतल ।
व्याख्या-नदियाँ हमे निरन्तर चलने का सीख देती है बिना रूके कर्म करने का ।
Wow❤️
ReplyDelete🤗🤗
ReplyDeletebahut sundar
ReplyDelete❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
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