जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
शीर्षक - " नदी "
विधा - सायली
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मैं
नदी हूँ
घबराती नहीं कभी
निरंतर बहती
रहती।
लाख
अड़चनें हो
या कठिन डगर
जारी रखती
यात्रा।
कभी
समतल मैदान
कभी पहाड़ी रास्ते
रूकना सीखी
नहीं।
हरियाली
लाती मैं
खेत खलिहानों पर
बनती झरना
भी।
फिर
तू क्यों
हारता हालातों से
सीख मुझसे
कुछ।
जिंदगी
तेरी भी
मेरी तरह बढ़ती
सुख दुःख
में।
मैं
गंगा पावन
प्यास बुझाती रही
धरा का
सदा।
लेकिन
मलिन हुआ
इंसानों की लापरवाही
गंदा पानी
विसर्जित।
शुरू
करना होगा
स्वच्छता की मुहिम
पवित्रता बचाने
में।
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Bahut badhiya mama 👌👌👌
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