जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- पर्रा भर लाई
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ज्यों ही रवि ने थक हार कर,
अपने बसेरे का रूख किया।
तम ने पांव पसारी ऐसे,
चहुं ओर अंधेरा घुप्प किया।
थक कर मनु मन ने,
अलशाए ली अंगड़ाई।
शशांक ने नभ में आभा बिखेरी,
चमकी चांदनी ज्यों "पर्रा भर लाई"।
ऐसा लगता देखकर नभ को,
स्लेट में नवसिखिए ने चाक चलाई।
फिर गलत हो गया सोंचकर,
हल्के हाथों डस्टर चलाई।
अधमिटे स्लेट सदृश्य आसमान,
लेकर लिखे नव शब्द ये अरमान।
फिर बिखेरती लाली उषा अकुलाई,
मानो समेट लिया किसी ने,
नभ में बिखरी "पर्रा भर लाई"।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने प्राकृतिक रूप से सुबह शाम हो रहे आसमान में बदलाव को सुंदरता से पिरोने का प्रयास किया है।
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