जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - छंदमुक्त कविता ( छत्तीसगढ़ी रचना )
शीर्षक - " सत् के रद्दा "
भाव - रचनाकार प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से सभी को सत्य की राह पर चलकर सत्य की प्रकाश फैलाने को बोल रहे हैं।
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पर्रा भर लाई, जग मा बगराई।
सुन ददा अऊ मोर दाई।
खाहू बस सत् के कमाई।
माटी के ढेला हरौं संगी,
काकरो तीन पाँच ल नइ मानौ ।
सोज रद्दा म रेंगथव मैं ह,
काकरो अमरिसाई ल नइ जानौ ।।
समझौ सबो के कल्लाई।
पर्रा भर लाई, जग मा बगराई।
आने के हक ल मार के,
अपन पेट ल भरे नइ जाय।
गरिभा के कौंरा ल छीन के,
गप ले अपन मुँह म नइ खाय।।
सब ल देखत हे दुर्गा माई।
पर्रा भर लाई, जग मा बगराई।
जइसने करम करबे,
उसने तो फल ल पाबे।
कांटा ल रद्दा म बों के,
सुघ्घर फूल ल कहाँ पाबे।।
होहि सब्बो के यहीं भरपाई।
पर्रा भर लाई, जग मा बगराई।
सबके देखोइया ऊपर वाला,
अपन तराजू म तोलत हे।
कभू हंसाथे ये जिंदगानी,
त कभू कभू रोवत हे।।
कर लौ सत् के तुमन कमाई।
पर्रा भर लाई, जग मा बगराई।।
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Ek no
ReplyDeleteएकतरफा
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