रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'मानव जीवन धन्य है'
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मानव जीवन धन्य है , रचा है सृजनकार ।
प्राप्तकर इस जीवन को , कर लेना साकार ।।१।।
मानव जीवन से रहा , प्रभु को भारी प्यार ।
इस कारण विवेक दिया , करके कृपा अपार ।।२।।
मनुज जीवन ईश्वर का , लगता है उपहार ।
नर तन को पाके करो , सदैव ही उपकार ।।३।।
सब प्राणी से मनुज को , प्रभु ने दिया विचार ।
मानव कलेवर पाकर , लाना स्वयं निखार ।।४।।
जीवन अपना सँवारो , न पालो अहंकार ।
सन्मार्गपर चलके निज , जीवन जन्म सुधार ।।५।।
पानी के बुलबुला सा , मनुज जीवन गवाँर ।
पल में यह लुप्त होगा , ज्यों तारा भिनसार ।।६।।
गलती से भी किसी का , मत करना अपकार ।
जीवन में करते रहो , जीव मात्र से प्यार ।।७।।
सभी प्राणी में बसते , जग के पालनहार ।
जीव हत्या मत करना , यह है नीच विचार ।।८।।
स्वार्थ सिद्धि हेतु अपना , जीव को नहीं मार ।
पाप बड़ा जीव हत्या , इससे नहीं उबार ।।९।।
जीने का सब ने यहाँ , पाया है अधिकार ।
परमार्थ को अपनाना , ईश भक्ति यह सार ।।१०।।
विद्या पाठ करके तू , बढ़ा ज्ञान उजियार ।
जीवन में कष्ट देता , मूढ़ता अन्धकार ।।११।।
सादा जीवन जिओ सब , रखना उच्च विचार ।
समभाव 'ठाकुर' रखके , करना जीवन पार ।।१२।।
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व्याख्या--इस रचना में मानवीय सद्गुणों एवम्
सन्मार्गोंपर चलकर जीवन जीने के
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