जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय-जीवन पर आधारित
विधा- छंद मुक्त
शीर्षक- *जिंदगी*
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कुछ-कड़वे-कड़वाहटों का नाम है जिंदगी,
हक से हलाहल पीने का पैगाम है जिंदगी ।
पैदा हुआ सो मृत्यु तो आएगी ही,
पर रोते-रोते मुस्कुराने का मुकाम है जिंदगी ।।
फरेबी मुखौटों का खेल है जिंदगी,
अप्रत्याशित-अप्रवाहित प्रवाह का मेल है जिंदगी ।
ग़र जीना ही है तो जियो खुले आसमॉं में,
भयावह-भयाक्रांत तिहाड़ सी जेल है जिंदगी ।।
अपना नहीं बस सपना है जिंदगी,
कोयले के ढेर में रह-रह कर तपना है जिंदगी ।
साधु संतों का जमावड़ा कदापि नहीं,
फिर भी मन का फेर मन में जपना है जिंदगी ।।
प्रतिदिन-प्रतिपल खुद का खोज है जिंदगी,
कीचड़ के दलदल में खिलता हुआ सरोज है जिंदगी ।
नजरों में समदर्शिता का भाव रखना,
अच्छा-बुरा एक थाल पर परोसा हुआ भोज है जिंदगी ।।
खुद का अस्तित्व पहचानना है जिंदगी,
कई दुनिया में इक दुनिया छानना है जिंदगी ।
बहरी दुनिया में कोई न सुनेगा यहॉं,
ध्वनित जग में खुद को सुनाना और खुद ही सुनना है जिंदगी ।।
आत्मा के शरीर का स्वरूप है जिंदगी,
एक अदृश्य शोर है पर अंतस में चुप है जिंदगी ।
कांटो भरी दिखती है हर डगर,
पर सुगंध से भर देती कोई मधुपुहुप है जिंदगी ।।
हंसने रोने गाने गुनगुनाने का भाव है जिंदगी,
सब होकर भी इक अकिंचन-अभाव है जिंदगी ।
जीना है तो मुस्कुराने की कला सीख लो,
सरलता सहृदयता सा समभाव है जिंदगी ।।
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
ज़िन्दगी की बहोत बेहतरीन परिभाषा👌
ReplyDeleteबहुत ही सटीक परिभाषा।
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteVery nice line
ReplyDeleteशानदार रचना आपकी
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