Friday, July 17, 2020

जांजगीर-चांपा से गिरधारी लाल चौहान की रचना:- अपन ल खोजा

नाम----गिरधारी लाल चौहान
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा---कविता
शीर्षक -- अपन ल खोजा

व्याख्या ---कवि के द्वारा  अपनी छत्तीसगढ़ की संस्कृति और कार्य शैली दूसरों का अनुकरण करने पर चिंता व्यक्त किया गया है कवि का आशय है कि हम किसी  अन्य संस्कृति को अपनाकर गुलाम न हो जाए ।
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 अपन ल खोजा

धोती लुगरा के पहिरोइया,कमतीयात जात हे ।
जिंस साड़ी के पहिरोइया,अकतीयात जात हे ।

एही सबले बड़े चिंता के बात हे ।
एही सबले बड़े चिंता के बात हे ।

अपन ल छोड़ हमन ,परके मुंह ताकत हन ।
परके हांसी ल धरके, गजब हमन हांसत हन ।
अपन हमर हांसी ,मुरकेटात जात हे ।

परके भाखा ल, चलत हन पोटार के ।
देखन अपन भाखा, कनेखी निहार के ।
हमरे आघू हमर भाखा ,छटपटात जात हे ।

खेती पाती ल छोड़, परके डेहरी राखत हन ।
बघवा के धरोइया ,कोलिहा  देख कांपत हन ।
लोहा कस जिनगी हमर,पकपकात जात हे ।

परके खाई खजाना म  ,मन तन बसाये हन ।
चना मुर्रा अंगारक छोड़,  बिस्कुट म भुलाये हन ।
लकरी छेना फेंक फांकके, गैस  उड़ात जात हे ।

गिरधारी लाल चौहान

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