Friday, July 17, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना:- मोर छत्तीसगढ़

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
   शीर्षक  -  " मोर छत्तीसगढ़ " 
     विधा - छंदमुक्त (छत्तीसगढ़ी रचना ) 
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तोर महिमा अब्बड़ भारी,
मोर छत्तीसगढ़ महतारी। 
नरवा घुरवा अऊ कोला बारी, 
आनी बानी के तोर चिन्हारी।। 

महानदी के पावन धरा म, 
तैं बिराजे हस। 
रंग-रंग के गहना ल, 
तैर साजे हस।।
हरियर सारी पहनें जैसे सुन्दर नारी। 
मोर छत्तीसगढ़ महतारी।।

भोरमदेव, राजिम अऊ शिवरीनारायण, 
दुनिया भर में करावत तोर पहचान हे। 
गिरौदपुरी के घासीदास बाबा, 
सोन चिरंइया तोर सोनाखान हे।। 
चन्द्रपुर के माँ चन्द्रसेनी,अऊ दाई मोर खल्लारी। 
दंतेवाड़ा के माँ दंतेश्वरी, अऊ रायपुर के माँ बंजारी।।

कल-कल करत हे तोर, 
चित्रकुट के लहरा।
तीरथगढ़ के महिमा, 
अब्बड़ गहरा।।
सुग्घर बस्तर के नर अऊ नारी। 
रूख राई के ओमन पुजारी।। 

नून बासी के खवोइया,
इहां के मनखे। 
अपन रद्दा म ही रेंगे जानथे। 
महतारी मानथे ये पावन भुइंया ल, 
संस्कृति ल ददा कस मानथे।। 
नइ जानय झूठ लबारी। 
निच्चट भोला, मोर छत्तीसगढ़ के संगवारी।। 

सोंहारी बरा तीज तिहार म बनथे,
बिहनिया ल खाथे अंगाकर। 
टेक्टर, हार्वेस्टर के जमाना आगे हे, 
तभो ले फांदथे नांगर।। 
छत्तीसगढ़ के संस्कृति अभी भी हे जारी।
अर् तता ल बइला चलथे, परथे जब तुतारी।। 

रिंगी-चिंगी के पहोनोइया नोहय,
लुगरा, नंगमोरी, करधन गहना हे। 
माँग भर सिन्दुर सुहागिन सजाथे, 
अऊ नाक म फूली,जब तक जाँवर जोड़ी सजना हे। 
गोड़ म महुर के सुग्घर कलाकारी। 
हाथ भर चूरी, फबथे अब्बड़ भारी।। 

     
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