जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-मूक वेदना
हरीतिमा की चादर
नैसर्गिक सौंदर्य,
आल्हादित करती
उपत्यकायें , झरने,
अब वीरान कंदरायें,
प्यासी नदियों की
मूक वेदना व क्रंदन।
अलख हरि की माया,
कहीं धूप कहीं छाया।
गांव के शांत गलियारे से
शहर के अट्टालिकाओं
तक की यात्रा करते
समय के साथ बदलती
संस्कृति व विलुप्त हो रही
सभ्यताओं का साया
अलख हरि की माया,
कहीं धूप कहीं छाया।
विरासत में मिली नसीहतें
आज जोड़ने को काफी है
टूटे रिश्ते,टाट के पैबंद,
मानवता ताक में रखकर
समेट रहा है मानव अपने
कर्मो का फल घर की
कोठरी में होकर बंद।
अलख हरि की माया।
कहीं धूप कहीं छाया।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
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