जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - छंदमुक्त कविता
विशेष - " अलख हरि की माया, कहीं धूप कहीं छाया " कहावत का प्रयोग।
शीर्षक - " ईश्वर की महिमा "
भाव - रचनाकार प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से भगवान की महिमा का गुणगान तथा जीवन की क्षणभंगुरता को प्रस्तुत किया है।
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चारों दिशाओं में जो है छाया,
जिसका पार कोई न कर पाया,
अलख हरि की माया ।
कहीं धूप कहीं छाया।।
हरि की महिमा बहुत निराली,
मन बगीचे का ओ ही माली,
प्रेम का पानी सींचता जो,
हर पौधे की करता है रखवाली।।
जिसको ढूंढा बाहर मैंने,
उसे मन में ही अपने पाया।।
अलख हरि की माया ।
कहीं धूप कहीं छाया।।
जीवन क्षणभंगुर है,
बारिश में बुलबुले-सा शरीर है।
न कर अभिमान तू अपने तन पर,
मौत के आगे कौन होता शूरवीर है।।
जितना भी तूने धन कमाया,
क्या जान तेरी ओ बचा पाया।।
अलख हरि की माया ।
कहीं धूप कहीं छाया।।
माना ईश्वर के हैं रूप अनेक,
पर आत्मा में बसती सबकी एक।
खुद की परछाई भी कभी दिखती नहीं,
कर जाती मौत का अभिषेक ।
भगवान ने भी अजीब दुनिया बनाया,
कोई अपना कोई पराया।
अलख हरि की माया,
कहीं धूप कहीं छाया।
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Jai ho
ReplyDeleteसुपर
ReplyDeleteBahut badhiya...
ReplyDeleteMst nice
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