Monday, July 13, 2020

रायगढ़ से गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" कृत आलेख- हरियाली

रचनाकार-गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय-पर्यावरण और हरियाली पर्व 
विधा-आलेख
शीर्षक- *हरियाली की हरीतिमा*
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सावन का महीना सुनते ही मन में हरियाली की हरीतिमा छाने लगती है, मन हर्ष उल्लास से मधुमास सा महकने लगती है ।फूलों की क्यारियां और वह भीगी-भीगी अलसाई सी गलियां मन को  गुदगुदाती नजर आती हैं।
बारिश की बूंदों को जमीं की प्यास बुझाना ऐसा प्रतीत होता है जैसे सच में बरसों से किसी शराबी की प्यास आज बुझाने साक्षात मधुशाला चल के आई हो।सूखे-सूखे वृक्ष की टहनियॉं धूल कर तरोताजा हो गई हैं, साथ ही पत्ते नए-नए नजर आ रहे हैं चारों ओर फूलों की मादकता चरम सीमा पर पहुंच चुकी है, संपूर्ण वृक्ष एक नई काया में नव पल्लवित नवोदित दिखने लगी है । झिंगुर दार्दूर की ध्वनि चारों ओर गुंजायमान होने लगी है तरह-तरह के चिड़ियों की चहकने की आवाज मन में कलरव करने लगे हैं, बूॅंदों की छप-छप करती छपछपी आवाज जैसे किसी नृत्य की थीरकन को बयां कर रही हों ।
              बच्चे बूढ़े सब बिजली की कड़कड़ाने से पहले भयभीत होने लगते हैं फिर अचानक बारिश की रिमझिम बरसात में हर्षोल्लास झूमने लगते हैं। जैसे प्रकृति खुद बिजली की चड़क-धड़क के साथ दिवाली, और बारिश की मदमस्त महकती सोंधी सोंधी खुशबू वाली रंगों के साथ होली खेलने को आतुर हो । कैसा अनोखा अनुपम दृश्य है स्वयं प्रकृति आज मानव समाज के बीच अपनी अहमियत सिद्ध कर रही है। प्रेमी प्रेमिकाओं की प्रेम-माधुर्य,विरह-वेदना एक उच्च शिखर पर होती है सब में राधा कृष्ण की छवि नजर आती है।
           खेतों की लहलहाती फसल किसान समुदाय के चेहरे पर मुस्कान बिखेर रही, नव अंकुरित बीज अंकुरण से जीव और जगत के मध्य रिश्तों की पैमाइश कर रहे हैं ।कंधे पर हल थामा हलधर किसान जोड़े पर सवार दो बैल लिए हॉंक लगाता हुआ ऐसे चला जा रहा है जैसे सारे कर्तव्यों किसी जिम्मेदारियां आज किसी कुरुक्षेत्र पर ले आई हैं ।
    सृष्टि की उपज हम सारे वही फसल हैं जिन्हें जीवन पर्यंत लहराना है तो उन्हीं हवा के झोंकों को बहना होगा, उन्हीं जल धाराओं को तन सींचना होगा, वैसे ही किसी किसान को बार-बार मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बरकरार रखना होगा । जिस तरह माता पुत्र का रिश्ता एक दूजे के प्रति विश्वास और कर्म कर्तव्य से बंधा होता है उसी तरह हमें भी अपना कर्तव्य निर्वहन करना होगा। "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"केवल एक उद्धरण नहीं है वरन् संपूर्ण मानव प्रजाति के लिए एक व्यापक संदेश है क्योंकि जन्म भूमि को अर्थात इस धरा को माता के तुल्य स्थान दिया गया है, तो हमें भी इनका सम्मान करना होगा।

सृष्टि हरा रहे हरियाली रहे,
खुशी से भरा रहे खुशहाली रहे।
संकल्प हो दिल से पूजने का,
तो हर वक्त ईद और दीवाली रहे ।।
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" 

6 comments:

  1. नवीन उपमा का प्रयोग देखने मिलता है आपकी रचना में।🌺🌺

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  2. नवीन उपमा का प्रयोग देखने मिलता है आपकी रचना में।🌺🌺

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