जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - छंदमुक्त कविता
शीर्षक - " महामारी और बेरोजगारी "
भाव - रचनाकार द्वारा प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से वैश्विक महामारी कोरोना के प्रभाव तथा उसके कारण श्रम क्षेत्र में फैली बेगारी का वर्णन करने का प्रयास किया गया है।
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कैसी ये महामारी आई है।
सब पर सामत बरपाई है।।
मौत ने ली अंगड़ाई है।
प्रकृति की ये जम्हाई है।।
कहाँ से शुरु हुई,
कहाँ आ गई ये मौत का खेल।
मेलों के इस भारतवर्ष पर,
बंद हुआ इंसानों का मेल।।
हर तरफ हो रहा सेनेटाइजर की छिड़काई है।
हैंडवाश से हो रहा हाथ की सफाई है।।
मौत के इस तांडव में,
ज़िन्दगी सस्ती हो गई।
कब्रिस्तान हुआ गुलजार,
और सुनी बस्ती हो गई।।
जाल कोरोना ने अपनी बिछाई है।
मानव पक्षी सा अब फड़फड़ाई है।।
एक तरफ मासुमों की चीखें,
एक तरफ आंसूओं की धार।
प्यास मेरी भी अब बुझ गई,
धरती माँ अब करे पुकार।।
व्यथा कही न जाई है।
वायरस के साथ भूख से लड़ाई है।।
कैसी ये परिस्थिति,
कैसा ये मंजर है।
दूधमुही बच्ची माँ के सीने में,
और माँ पालिथीन के अंदर है।।
दिल को जान से जुदा कर आई है।
आँखों में आँसू मेरी भी भर आई है।।
कहीं गई एक माँ की जान,
कहीं कर न पाया बाप कन्यादान।
खूनी बारिश से सींच गई,
किसानों की धरती मेरा हिन्दुस्तान।।
बाप करा न पाया आज सगाई है।
मौत के साथ हुई उसकी विदाई है।।
मजबूर, ये मजदूर हो गए।
रोजगार से दूर वो हो गए।
पलायन की नौबत आ गई,
इसी कश्मकश में पैदल वो चल गए।।
घर में चूल्हा न जल पायी है।
राशन की तो बहुत तंगाई है ।।
कल कारखाने सब बंद पड़े हैं।
गेट में सबके ताला जड़े हैं।
मध्यम वर्ग करे तो क्या करे,
नौकरीपेशा लोग बेरोजगार खड़े हैं।।
बड़ी मुसीबत इन पर आई है।
हर तरफ बेगारी छाई है।।
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Nice dir
ReplyDeleteBhut khub sir
ReplyDeleteGood
ReplyDeleteKya baat h sir ji...
ReplyDeleteSuperb
ReplyDeleteTrue Covid 19 take care
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