जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय- *कोरोना से उत्पन्न बेगारी की समस्या*
विधा-छंद मुक्त
शीर्षक- "कोरोना की उपज"
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यहॉं-वहॉं-जहॉं देखो कोरोना,
यह कैसी महामारी है और कैसा रोना?
भूखे-गरीब-लाचार को छोड़,
ऐ कोरोना! जरा अमीरों को भी हो ना ।।
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धीरे-धीरे तूने पॉंव पसारा है,
बेमौत मरे पर ये जहां हमारा है ।
अब तरस खाओ मानवता पर,
लो जमीं हमारी और आसमां तुम्हारा है ।।
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कोई लेहड़ी वाला तो कोई मजदूर दिहाड़ी है,
विश्वगुरु का सपना अब लगता पछाड़ी है ।
आधुनिकता के अपराध ने,
समाज के कबंध पर मारी कुल्हाड़ी है ।।
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भावी बच्चों की पाठशाला बंद है,
शिव भक्तों की मधुशाला बंद है ।
प्रेमी युगलों की विरह बढ़ी,
समाज की सामाजिक वरमाला पे पाबंद है ।।
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कोरोना तुमने रोटी के निवाले छीने हैं,
महाकाल शिव के वो शिवाले छीने हैं ।
दुनिया आह से आहत हुई ऐसे,
जैसे मरहम हैं पर जख्मों के छाले छीने हैं ।।
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मॉं के कर्तव्यों का बोझ बढ़ गया,
बेगारी राक्षस विकास पथ अड़ गया।
अर्थव्यवस्था नासूर होने लगा,
मानो किसी घाव से पूरा पॉंव सड़ गया ।।
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कलियुगी हाहाकार और कब तक देखेंगे,
बच्चे-बूढ़े-मजदूरों का चित्कार कब तक सुनेंगे ।
हे प्रभु किसी अवतार में तो आ जाओ,
कहो मृत्यु के दरबार में कब तक गिड़गिड़ाएंगे ।।
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भला सदी की सदाएं और कब तक रुलाएंगे,
कोरोना तुम चले जाओ वरना हम ही चले जाएंगे ।
इतिहास के काले पन्नों में,
लगता है यह कोरोना का काल ही कहलाएंगे ।।
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
Nice sir
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार 🙏
Deleteबहुत बहुत आभार 🙏
Delete👏👏👏👏👏👏
ReplyDeleteThank you eo much 🙏🙏
Deleteवास्तविक
ReplyDelete👏👏👏👏👏nice👍👍👍👍👍
ReplyDeleteबहुत सुन्दर 👍👍👍
ReplyDeleteसामयिक रचना।
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