ग्राम - बुलांकी
पोस्ट- गोर्रा
जिला - रायगढ़(छ. ग.)
विधा- कविता
शीर्षक- "तूने आज तक क्या किया"
"तूने आज तक क्या किया"
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हे मानव,
प्राचीन से लेकर आज तक मानव,
क्या तूने ज्ञान पाया।
मानव को दो वर्गों में बांटकर,
धनी निर्धन बनाया।
मार काट को बली बनाया,
निःशक्तों को दुर्बली।
प्रवचन कर्ता को ज्ञानी बनाया,
श्रोताओं को अज्ञानी।
अति पढ़ा को विद्वान बनाया,
न पढ़ने वालों को मूर्खादी।
अल्प पढ़ा को साक्षर बनाया,
हद कर दी तूने मनमानी।
चारों असमताएँ फैली हुई है,
राज्य,धर्म, परंपरा की देन से।
चारों विषमताएं चौखट बना है,
न मानव सुख से, न चैन से।
राज्य धर्म की परंपरा से मानव,
क्या आज तक कुछ कर पाया है।
चहूं ओर दु:ख सुख के बंधन को,
क्या आज तक तू समझ पाया है।
मानव क्या है?लक्ष्य क्या है?
आज तक किसी ने न जाना है।
भ्रम में पड़कर भ्रमित मानव,
क्या स्वयं के अस्त्तिव को पहचाना है।
जीव चेतना में जीना उसका,
निरंतर प्रवृति बन गयी है।
क्या ? यही वर्तमान का लक्ष्य है,
साधन, सम्पन्न होते हुए भी,
क्यो मन मे दर्द है।
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व्याख्या:- कवित्री इस कविता के माध्यम से कहना चाहती है कि मनुष्य ने प्राचीन से लेकर आज तक जो ज्ञान पाया है। उस ज्ञान से समाज को क्या दिशा दिया है। उसी के बारे में वर्णन किया है।मनुष्य जीव चेतना में जीते हुए स्वयं को नही पहचान पा रहा है,इसी लिए साधन संपन्न होते हुए भी, आत्मीय सुखी नही है ।।
उर्मिला सिदार
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