जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विधा - छंदमुक्त कविता
शीर्षक - " उत्थान से आधुनिकता तक "
विशेष - विश्व जनसंख्या दिवस विशेषांक
भाव - रचनाकार प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से मानव जन्म, उत्थान से आधुनिक समय तक के सफर का बखूबी वर्णन किया है तथा आधुनिकता का प्रभाव भी दिखाई है। साथ-साथ ही जनसंख्या वृद्धि के दुष्प्रभाव को दिखाते हुए उसकी निदानात्मक चर्चा भी की गयी है।
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महाकाल के प्रचण्ड से,
जब चिर सागर में शांत मन हुआ।
ईश्वर के अंश से निकलकर,
तब धरा पर तेरा आगमन हुआ।।
नर नारी के भेष में,
दो फूल प्रकृति में खिलने आई।
मानो स्वयं शंभू ही,
माँ उमा भवानी से मिलने आई।।
नवीन कली का नवनिर्माण हुआ।
आज पैदा एक इंसान हुआ।।
ऋषि मुनियों का यह भारतवर्ष,
परिपूर्ण था जहाँ प्रेम और हर्ष,
गुरू शिष्य का ओ पावन बंधन,
सत्यता पर होती सदा निष्कर्ष।।
फिर मानव का आगे उत्थान हुआ।
आधुनिकता की ओर प्रस्थान हुआ।।
आधुनिकता की इस दौड़ में,
लगे सब स्वार्थ की होड़ में ।
मानव प्रेम विलीन हुई,
धन-दौलत के इस भाग-जोड़ में।।
रिश्तों का न सम्मान हुआ।
बैंक बैलेंस ही पहचान हुआ।।
संस्कृति का पतन अब होने लगा।
अपनी ही दुनिया में खोने लगा।।
न रखता मतलब कोई किसी से,
स्वयं की गलती पर खुद रोने लगा।।
मानव को क्यों इतना अभिमान हुआ।
अपनों से ही अंतर्ध्यान हुआ ।।
माना खड़ा कर ली तुने,
बड़ी बड़ी इमारत।
नयी विधियाँ, नयी तकनीक
कर ली तुने इजारत।।
सृजन इनसे रोज़गार हुआ।
फिर क्यों आदमी बेरोज़गार हुआ।।
अस्त्र बढ़ा शस्त्र बढ़ा,
जनसंख्या भी बढ़ गयी।
भुखमरी और बेगारी से,
इंसान, इंसान से भी लड़ गयी।।
जनसंख्या से गुलजार मंदिरापान हुआ।
दुश्मनी, द्वेष का आदान-प्रदान हुआ।।
बाल विवाह का संहार किया,
महिला शिक्षा का भी प्रसार किया।
शिशु मृत्यु दर कम कर,
परिवार नियोजन पर भी काम किया।।
नई नीतियों पर मोहरदान हुआ।
जनमत भी विचारवान हुआ।।
बढ़ती इस समस्या पर,
अंकुश लगाना होगा।
हम दो, हमारे दो का,
पाठ सिखाना होगा।।
गर्भनिरोधक इसका वरदान हुआ।
जागरुकता का भी गुणगान हुआ।।
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