स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ {छग }
विधा--कविता { सार छन्द }
शीर्षक--'अंधविश्वास घातक होता'
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जड़ जमाया है जोर देके , जन मानस में भारी ।
अंधविश्वास घातक होता , मूढ़ता बहुत सारी ।।
काटती कभी रास्ता बिल्ली , उसे अशुभ है माना ,
तब तत्काल रोक देते हैं , बढ़के आगे जाना ।
पत्थर फेंक फिर आगे बढ़ें , ऐसी प्रथा हमारी ।।
अंधविश्वास घातक होता , मूढ़ता बहुत सारी ।।१
कोई कभी कहीं जाने को , आगे कदम बढ़ाता ,
छींक सुनकर पाँव उसका है , तुरंत ही रुक जाता ।
धरी की धरी रह जाती है , उसकी सब तैयारी ।।
अंधविश्वास घातक होता , मूढ़ता बहुत सारी ।।२
काग युग्म की रति क्रीड़ा को , अगर देख लेते हैं ,
मृत्यु दोष जो देखे उसपर , तुरन्त मढ़ देते हैं ।
मौत की खबर सम्बन्धी में , भेजते अशुभकारी ।।
अंधविश्वास घातक होता , मूढ़ता बहुत सारी ।।३
अंध श्रद्धा पालनेवाले , कई लोग मिल जाते ,
ठगे जाते रहे धूर्तों से , पीछे अति पछताते ।
इसके शिकार कई पुरुष भी , हो जातीं हैं नारी ।।
अंधविश्वास घातक होता , मूढ़ता बहुत सारी ।।४
पशु-पंछी की बलि देना भी , अंधविश्वास प्यारे ,
इससे सफल नहीं होते हैं , अपने अभीष्ट सारे ।
कर्मप्रधान मनुज जीवन में , कर्म का मान भारी ।।
अंधविश्वास घातक होता , मूढ़ता बहुत सारी ।।५
दकियानूसी विचार छोड़ो , होता 'ठाकुर' रोड़ा ,
पढ़े-लिखे विद्वानों का भी , इसने गला मरोड़ा ।
भय वर्द्धक अंधविश्वास है , मिटाता समझदारी ।।
अंधविश्वास घातक होता , मूढ़ता बहुत सारी ।।६
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व्याख्या--अंधविश्वास , अंध श्रद्धा , पशु-पक्षियों की
बलि प्रथा समेत अनेक दकियानूसी विचार
अंधविश्वास ही हैं।स्थान-स्थानपर अनुप्रास
अलंकार समावेश करने का प्रयास किया
गया है ।
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