जिला :- महासमुंद
विषय :- अंधविश्वास पर प्रहार
विधा :- छंद मुक्त कविता
अलंकार :- अनुप्रास अलंकार
शीर्षक :- विश्वास करो विज्ञान पर।
पोथी पढ़कर ज्ञान मिला,
मिला ना हमको सीख,
अक्सर अवसर आने पर,
दिन में भी जाते प्रेत दिख।
ज्यों काटे कोई सर्प कभी,
या आ जाता मोंच,
दौड़ दर गए ढोंगी के,
देते दौलत झोंक।
अंधविश्वास की जकड़न से,
होत सकल ज्ञान जड़,
फिर - फिर चाहे विश्वास हमारी,
जाऊं विज्ञान से लड़।
है विश्वास जीवन का खेल,
है हाथों की लकीरों में,
कभी भटरी, कभी बाबा से पूछे,
पूछे कभी फकीरों से।
ये मनुज मान बात मेरी,
मत पड़ इन सबके फेर में,
अंधविश्वास में आत्मशांति ढूंढना,
सुई जो भूंसे की ढ़ेर में।
मत मान बात फकिरों की,
जो ग्रह दिशाएं बदले हैं,
अगर हाथ में उनके सबकुछ,
तो दर - दर क्यों भटके हैं।
भटका जोगी जग को कहता,
विश्वास करो विज्ञान पर,
मत रहो अंध भक्ति में औरों के,
रखो भरोसा निज ज्ञान पर।
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने अंधविश्वास की अंधी पट्टी को आंखों से हटाकर विज्ञान और निज ज्ञान पर भरोसा रखने की बात कही है।
रचनाकार ने अनुप्रास अलंकार से कविता का अलंकरण करने का प्रयास किया है।
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