Saturday, July 4, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- अंधविश्वास का बोलबाला

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
   विधा - छंदमुक्त कविता 
   अलंकार - अनुप्रास अलंकार  
   शीर्षक  -  " अंधविश्वास का बोलबाला "

भाव - रचनाकार द्वारा प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से अंधविश्वास पर कटाक्ष करते हुए व्यंग्यात्मक रूप  से निशाना साधने की कोशिश किया गया है। 
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तर्क-वितर्क, को तार-तार करके, 
ज्ञान विवेक का, तर्पण करके,
शिक्षा के तराजू में न तोल के, 
क्यों चलता तू आँख बंद करके । 
जान के भी अनजान तू बन रहा। 
अंधविश्वास का पालन तू कर रहा ।।1।।

जिंदा था तब तक जान भी जहान भी, 
मृत्यु पश्चात जा रहा शमशान भी, 
लाश छू कर बार-बार तू नहाता  है। 
निर्दोष जीव को मार कर, फिर क्यों खाता है।। 
बेजुबान जानवर की बलि चढ़ रहा।
बंदगी ईश्वर की कैसी तू कर रहा ।। 2।।

देकर तू दान, दान पेटी में , 
देता पंडित पर रेशम के कपड़े वार ।
अन्न, द्रव्य से भर दे झोली तू, 
खुलेंगे तभी तेरे स्वर्ग के द्वार।।
गरीब अनाथ का ध्यान तुझे नहीं आ रहा।
मुँह से निवाला छिन के उनके तू जा रहा।। 3।।

नहाकर गंगा में सब पाप धो आता है। 
फिर क्यों उसी पानी को, भरकर वापस ले आता है। 
एक पत्थर मंदिर में भगवान बन जाता है। 
इंसान रोज मंदिर जाकर भी, 
पत्थर बन जाता है।।
ममता की मूर्ति, माँ को, माँ नहीं तू मान रहा। 
मरने को वृद्धाश्रम में, क्यों छोड़ कर तू आ रहा।। 4।।

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अनुप्रास अलंकार :--

।।1।। इस पंक्ति समूह में "त" वर्ण की आवृत्ति। 

।।2।। इस पंक्ति समूह में "ज" तथा "ब" वर्ण की आवृत्ति। 

।।3।। इस पंक्ति समूह में "द" वर्ण की आवृत्ति। 

।।4।। इस पंक्ति समूह में "म" वर्ण की आवृत्ति। 

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