रचनाकार- श्रीमती रजनी शर्मा बस्तरिया
जिला- रायपुर छत्तीसगढ़
विधा- मुक्त छंद
नागमोहरी......
बाजूओं में बंधा नागमोहरी,
महज एक आभूषण?
बाजूओं को कसने का ।
इसे पहन" बायले",
चलती है कई कोस नंगे पांव।
कभी केऊंर केऊंर पाना पर ,
कभी चुभते पखना पर।
हाट पहुंच कर रखती है गप्पा,
सजाती है कोदो ,तिखुर ।
जुटाती है कुछ पैसा ,
पिला मन के बोबो लिये ।
भात के लिये जुट जाये नोन,
और नागमोहरी को कस।
तरेरती है आंखें कोचिये को,
सुलगाती है भीतर के जोय को।
और हां बचा ही लेती है,
अपने वज़ूद के नमक को।।
(शब्दों के अर्थ)
बायले=महिला
केऊंर=नरम
पाना=पत्ते
पखना=पत्थर
गप्पा=टोकनी
हाट=बाजार
तिखुर=स्थानीय कंद
बोबो= पकवान
नोन=नमक
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