02. जिला :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
03. रचना का शीर्षक :- *समय*
04. छंद :- मुक्तक
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_*समय*_
समय कोई निर्विकार,निरापद निर्मोही यति है
इसकी अपनी धुरी,अपनी तरंग अपनी गति है
इसके अटल तप के सम्मुख
लज्जित हैं शिलाएँ
इस पर निष्प्रभावी हैं
ऋतुचक्र की लीलाएँ
ये न जेठ में झुलसता है
न सावन में भीग पाता है
बसंत इसे लुभाता नहीं
न कार्तिक ठिठुराता है
टिक-टिक का जाप करता है
पर खुद टिकता नहीं है
समय की छाप दिखती है सब पर
पर वह खुद दिखता नहीं है
वृक्षों की छाल पर
मनुजों के भाल पर
रेखाएँ खींचता रहता है
हमारी नश्वर अंजुरी से
ये अनश्वर बूँद-बूँद
छीजता रहता है
यह वर्तमान का सहयात्री है
अतीत का साखी है
भावी कल को रचने वाला
समय अविरत पाखी है
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bahut khoob
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