अमलदार नीहार
हिन्दी विभाग
श्री मुरली मनोहर टाउन पीजी काॅलेज, बलिया(उत्तर प्रदेश)
प्रेमचंद के प्रति-
उपन्यास-सम्राट कहूँगा नहीं, तुझे मैं कहूँ किसान,
राजकुमारों को ले आया डाँड़-मेंड़ खेत-खलिहान ।
अबला बनी 'निर्मला' में भी नारी-पीड़ा का सन्धान
'रंगभूमि' यह, 'कर्मभूमि' यह, धनिया-होरी का 'गोदान' ।
बड़े घरों की बेटी देखी, देखी वह बूढ़ी काकी फिर,
पंचो में परमेश्वर देखा , अब रहा नहीं कुछ बाकी फिर ।
घीसू-माधव घोर निठल्लों की दुनिया की मारी है
कफ़न बिना, सह पीर प्रसव मृत वह बुधिया बेचारी है ।
मर मिटते हैं झूठ-मूठ कितने शतरंज-खिलाड़ी हैं,
देश-जाति-धन-विषम व्यवस्था पर चुप निपट अनाड़ी हैं ।
'सोज़े-वतन' जिसे पढ़ कायर-लहू कलेजा मुँह को, थाम
ले हर कोई दिल अपना या देशभक्ति का भाव प्रकाम ।
पर ठाकुर का कूप अभी भी, जाने कितने मोटेराम,
दारोगा कुछ नमक-महकमे के, उनको है कोटि प्रणाम ।
पूँजीवाद प्रपंच-व्यवस्था सामंती शोषण के नाम
पहली बार शरारे फूटे, भड़के शोले, काम तमाम ।
रात पूस की, दो बैलों की कथा, व्यथा के हैं अध्याय
मुंशी प्रेमचंद बन बैठा लमही का वह धनपतराय ।
शोषण-उत्पीड़न का दर्पण सेठ-महाजन-रूप विचित्र
दागदार प्रतिबिम्बित ऐसे जाने कितने पूत चरित्र ।
उसको कलम-सिपाही समझो या शब्दों का जादूगर
गद्यकार में तुलसी था वह रामचरित गोदान शिखर ।
पर तुलसी का 'लोक' न उसका था उसमें कुछ क्रान्ति कबीर
सामाजिक समरसता-साधक समतामूलक स्वप्न अधीर ।
No comments:
Post a Comment