कवि: डॉ बी. निर्मला
जिला: मैसूर
राज्य: कर्नाटक
शीर्षक: माँ
माँ
'माँ' शब्द से ना कोई छोटा,
ना कोई संसार में तुझसे बड़ा,
माँ, माई, माता, जननी नाम तेरे,
कोई भी विशाल न तेरे आगे।
ईश्वर ने बनाई कैसी तेरी मूर्ति,
तू इस धरा की महान विभूति,
देखा न आसमां के ईश्वर को,
तुझमें देखा धरा के ईश्वर को।
मानवीय भावनाओं का सागर
करती शिशु से निस्वार्थ प्यार,
भरा तुझमें प्रेम, दया, करुणा,
धैर्य, साहस, संयम, त्याग, सेवा।
सारे गुण, संस्कार कहां से,
कैसे तुझे ये सब प्राप्त हुए?
माणिक्य रूपी ये सब तेरे,
इत्ते से जिगर में कैसे समा गए।
शिशु को जन्म देती,उसकी पहली
धड़कन महसूस कर वही सुनती,
उसे बाह्य जगत का भी वही,
पहचान और दर्शन कराती।
नन्हें शिशु, मांस के लोथड़े को
वह एक साकार रूप है देती,
उसे परिवार और समाज का
एक अभिन्न अंग बना देती।
लालन - पालन, शिक्षा - रक्षा,
कर बनाती शिशु का व्यक्तित्व
उस निस्वार्थ, ममतामई मां के
बिना नहीं मेरा कोई अस्तित्व।
जीवन पर्यन्त, निस्वार्थ सेवा में डूब,
निरत काम है वह करती,
ना रखती अपना ख़्याल, न ही
किसी से, कोई अपेक्षा करती।
अच्छे संस्कार देकर शिशु के
चरित्र का निर्माण वह करती,
उसके सुख दुख में ही अपने
जीवन को सार्थक मानती।
कैसे संबोधित करूं तुझे,तू है
मेरी जीवनदायिनी, संजीवनी,
सबसे अलग, मेरी अंतरंग सखी,
सहनशीलता की सारथी।
सारी जिंदगी गुजार देती वह
घर परिवार को संवारने में,
हंसी खुशी, शिकवा बिना अपने
गमों को छिपा लेती मुस्कुराहट में।
तेरे प्यार, विश्वास से रिश्ते नाते,
घर परिवार सब हैं बनते,
तेरी दुआओं,आशीर्वाद से
हम सबके जीवन सफल हैं होते।
तुझसे मिला मुझे ज्ञान,गुण,
अनुभव,समाज सेवा भावना,
सदा करती तुम जीवन भर,
सबके लिए मंगल कामना।
धन्य माँ, तूने हमें जन्म दिया,
मेरे जीवन को सार्थक किया,
तुम हो मेरे लिए अतुलनीय, अद्वितीय,अनमोल,अमूल्य।
अवर्णनीय तेरी यह कहानी,
सब कुछ है याद मुझे जुबानी,
कर्ज न चुका पाऊं कभी मैं,
गुजरे जीवन पूजा,भक्ति में।
मिले जन्म यदि सौ बार मुझे,
हर बार 'माँ' तू ही मिले मुझे,
देखा नहीं ईश्वर कभी मैंने,
तुझे ही देखूं हरपल जीवन में।
स्वरचित कविता,
डॉ.बी.निर्मला,
एसोसिएट प्रोफेसर, (रिटायर्ड),
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