जिला-कांकेर
शीर्षक- *कविता का जन्म*
विधा-कविता (मुक्त छंद)
अंतर्मन में कोई द्वन्द्व हो,
मन को कहीं लगी ठेस हो,
बात कोई अस्वीकार्य हो,
विषमता की काली हो,
संबंधों में नागफनी उग
आये फड़फड़ाने लगे मन
तब कलम उगलती आग
और होता *कविता का*
*जन्म कागज पर*।
जब अमानवीय कृत्य
मानवता को करते
शर्मशार और संस्कृति
होती लहुलुहान तब
कलम से निकलते
प्रेमचंद के गोदान,
प्रसाद के आंसू और
हृदय को कचोटती हो,
महादेवी की यामा
और तभी होता
*कविता का जन्म*
*कागज पर।।*
झर-झर करते झरने,
कल -कल करती सरिता
झूमती बलखाती लताएं
कुसुमित बेलें आसमां
ताकते सैकड़ों जीवों को
पनाह देते विशाल पेड़
प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य
देख आल्हादित होता मन
और तभी *कविता का*
*होता जन्म कागज पर।।*
*मीरा आर्ची चौहान*
*कांकेर, छग*
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