Monday, July 13, 2020

रायगढ़ से उर्मिला सिदार कृत आलेख- पर्यावरण

रचनाकार -उर्मिला सिदार
ग्राम -बुलाँकी 
जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
विधा -आलेख 
शीर्षक- पर्यावरण /हरियाली पर्व

           🌷पर्यावरण🌷
 परंपरा में पर्यावरण को प्रचलित भाषा में, जो वस्तु हमारे आसपास दिखाई देते हैं उसे  पर्यावरण कहते हैं। शूक्ष्म रुप से अध्ययन करने से पता चला है कि प्रकृति 4 अवस्थाओं में व्यवस्था के साथ व्यक्ति है पहला पदार्थ अवस्था जो  3 स्वरूपों में व्यक्त है ।ठोस ,द्रव और गैस। दूसरा प्राणावस्था था इसके अंतर्गत पेड़, पौधे आते हैं ।तीसरा जी वावस्था इसके अंतर्गत जीव जंतु पशु पक्षी कीट पतंग आते हैं। चौथा है ज्ञान अवस्था इसके अंतर्गत मनुष्य आता है क्योंकि इस अस्तित्व में मनुष्य के पास ही समझने की ताकत है अर्थात ज्ञान है बाकी अवस्थाओं में समझने की ताकत नहीं है, इसीलिए मनुष्य इस धरती का उत्कृष्ट अवस्था है। इन समग्रता को ही प्रकृति या पर्यावरण कहा जाता है इन चारों अवस्थाओं में नियम के अनुसार एक दूसरे में अंतर संबंध बना हुआ है किसी एक अवस्था के ना होने से अस्तित्व की कोई पहचान नहीं होगी अतः इन चारों अवस्था सारस्वत इस अस्तित्व में देखने के लिए मिलता है यह नित्य वर्तमान रहते हैं इनकी आवर्तनशील्ता बनी हुई है। इन्हीं आवर्तनशीलता  मे ब्यवधान होने से प्रकृति की संतुलन बिगड़ती है। प्रकृति की संतुलन बिगड़ने से अनेक समस्याएं इस धरातल पर देखने के लिए मिलता है। अतः प्रकृति संतुलन को बनाऐ हुए इस की आवर्तन शीलता को बनाए रखना है। यही मनुष्य का प्रथम कर्तव्य है क्योंकि मनुष्य का जीना पर्यावरण से ही संभव है पर्यावरण ही जीने का आधार है जो जीने का आधार है उसे संरक्षित सुरक्षित एवं उसका सदुपयोग करना है मनुष्य का परम कर्तव्य है यही उसका धर्म है पर्यावरण है तो जीवन है पर्यावरण नहीं है तो सभी का मरण है अतः
 जिसके होने से हम हैं,
 उनका करो संरक्षण ।
उनके सुख की कामना ले ,
करो विचार और चिंतन।
 विचार और चिंतन से,
 कोई तो हल निकल जाएगा। आवर्तनशीलता बनी रहने से, धरती स्वर्ग बन जाएगा ।
ना यहाँ तेरा न यहाँ मेरा ,
यहाँं है सभी का बसेरा ।
जागृति की ओर बढ़े चलो,
 आएगा एक दिन नया सवेरा। कहने का तात्पर्य है ,इस धरातल पर इन चारों अवस्थाओं का रहना होता है यह तेरा मेरा नहीं है यहां सभी का बसेरा है अतः सभी को इस धरातल की व्यवस्था को बनाए रखने में अपनी भूमिका अदा करना चाहिए यही मनुष्य का मानत्व है।
 हरियाली पर्व:- हरियाली का पर्व पावस ऋतु में  की  सावन माह में
 रिमझिम फुहारों के साथ आगमन होता है प्रकृति की हरियाली छटा देख कर मन प्रफुल्लित हो जाता है ।काले काले बादलों का घुमडना ,बिजली का चमकना, रिमझिम बारिश का होना,  दादुरो का मृदु बोली,
 निशा कॉल में जिगोलो का संगीत, मयूर का मदमस्त होकर नाचना, पतंगा का उड़ना ,भवरो का गुंजना, तितली का मचलना कलियों का खेलना, कोपलों का निकलना, ठंडी पुरवइया का चलना ,पत्तों का झुलना, रंगों का कलरव, सारगो का आसमान में उड़ना,  कल कल करती हुई नदियों का गीत जल से भरा खेत खलियान एवं फूलों की वादियों से भरा एवं धारा की हरियाली श्रावण मास की छटा मन को मुग्ध कर देती है। इसी मास में हरियाली का त्यौहार हमारे छत्तीसगढ़ के किसान हरियाली की स्वागत में मनाते हैं।  धारा को हरियाली सजाने के लिए इस दिन पेड़ पौधे लगाइए जाते हैं अपने पारंपरिक कृषि हथियार और गाय बैलों की पूजा करते हैं एवं इस त्यौहार में भोजली जलाने की प्रथा है भोजली जगह पर इसकी पूजा अर्चना कर श्रावण पुणे के दिन विसर्जन करते हैं उसी दिन रक्षाबंधन का भी त्यौहार होता है अतः यह हरियाली का त्यौहार श्रृंगार से भरा और खुशहाली से भरा त्यौहार है ।नारियां हाथ में मेहंदी पैर में माहुर हरा धानी वस्त्र पहन कर सोलह श्रृंगार कर हरियाली की स्वागत करते हैं हरियाली का पर्व मन को लुभाने वाली पर्व होता है। सावन की घटा एवं सावन की छटा देखते ही बनता है। इस तरह हम लोग हर्षोल्लास के साथ हरियाली का त्यौहार मनाते हैं और खुशी जाहिर करते हैं।
 सावन आया झूम के,
 धरती मांँ को चुन के।

 उर्मिला सिदार

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