जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- यूंही नहीं फसल लहराता है
++++++++++++++++++++++++
खिंचता हैं कांधों से अपने,
खेतों में किस्मत की लकिर,
सिंच देता है दाना - दाना,
छोड़कर सर्वस्व अपनी तकदीर।
सिंचकर निज रक्त - स्वेद,
तब जाकर बीज अंकुरित हो पाता है,
यूं ही नहीं फसल लहराता है।
निज नींद - चैन त्यागकर,
तड़के से ही जाना होता है,
दिन रात रुक कर खेतों में,
कमरतोड़ कमाना होता है।
महीनों करता काम व इंतजार,
तब जा बालियों संग मुख मुस्का पाता है,
यूं ही नहीं फसल लहराता है।
कभी घटा घटाती है मनोबल,
कभी रोगों का होता है छल,
कभी जरूरत से ज्यादा जमीन सूख जाती,
कभी जरूरत से ज्यादा हो जाता है जल।
यूं ही नहीं सपनों में सोच कर ही,
फसल पक जाता है,
यूं ही नहीं फसल लहराता है।
होती है चिंता निदाई की,
हो फसल तो उनकी कटाई की,
रात भर नहीं सो पाता सोंचकर,
फसलों की ढुलाई व मिंजाई की।
यूं ही नहीं मेहनत की सही मूल्य,
वह ले पाता है,
यूं ही नहीं फसल लहराता है।
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने कृषि के कार्य में आने वाले बाधाओं को शब्दबद्ध करने का प्रयास किया है।
No comments:
Post a Comment