रचनाकार-एच-एस-अरमो" अरमान "
निवास-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
जिला--रायपुर ।
शीर्षक--गाँव का किसान ।
विधा--कविता (छन्द-मुक्त )
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***==गाँव का किसान ==***
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गाँव का किसान,
जोतता है,खेत में, हल--बक्खर,
अपना,मन बहलाने--
वो,गाता है,करमा ,ददरिया व पंडवानी।01।
वो करता,रहता बैलों से बातें,
तो कभी, मन ही मन में ,
करता,रहता,वो धरती से बातें ।02।
आज,इतना जोत लिया,
कल फिर,इससे भी,ज्यादा जोतूंगा,
हल की मुठिया को--
जोर -जोर से और दबाता,
यूहीं बैलों को,छड़ी से चमकाता,
अपनी उम्मीदों को,अंजाम दिलाता,
धीरे -धीरे , आगे ही बढ़ता जाता।03।
पर,जिस पशुधन से,
अपना,जीवन है चलता-फिरता,
सिर्फ़,उसको पशु समझ ,
काम लेने के बाद,
उसे ,उसके हाल पर ऐसे ही छोड़ देता।04।
क्या--?
हमारे देश के,
गांव के किसान--
इतना निर्दयी और भोला है,
जो अपना,जीवन दान करती है,
उसे,बेज़ुबान समझकर,
सिर्फ़,लाठी से हांकता रहता है,
पर,कभी भी,ढंग से,दुलारता नहीं है।05।
कहावत भी,यही बनी है--
"दुधारू गाय की लात भी भली "
पर,यहाँ तो,उल्टा ही दिख रहा है,
और गाँवों में,मिलते ,
अक्सर,मरियल पशुधन ही है ।06।
मैं,अपने,किसान भाईयों से कहता हूँ,
यदि,तुम,उनको दिल से दुलार करोगे,
समय रहते,उनके दर्दों का ईलाज करोगे,
वो भी,आपका जीवन-सपना साकार करेंगे ।07।
आधुनिकता और तकनीकी के दौर में,
गांव में,किसानों के पास ,
पशुधनों की,हो रही,भारी कमी ,
ट्रेक्टरों से होती जुताई व खेती,
गोबर-खाद,गोबर-गैसों की है कमी।08।
=========इति==========
व्याख्या:--उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि गांव का किसान अभी भी पशुधन की सही ढंग से सेवा-सुश्रशा नहीं करते हैं ।पशुपालन के महत्व को जोर नहीं दे पा रहे हैं जिसके कारण गावों अभी भी मरियल व कमज़ोर पशुधन मिलतें हैं ।यहाँ पशुधन की,किसान के बीच दुर्दशा को बताने का प्रयास किया है
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******मौलिक--प्रस्तुति :--
**एच-एस-अरमो "अरमान "
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