स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'संस्कृति का भण्डार छत्तीसगढ़'
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छत्तीसगढ़ राज्य रहा , संस्कृति का भण्डार ।
लोग मनाते रहे हैं , कई तीज - त्यौहार ।।१।।
रामनवमी-अक्ति सहित , फिर रथयात्रा जान ।
हरेली - नागपंचमी , राखी का सम्मान ।।२।।
हलषष्ठी - जन्माष्टमी , पोला - तीजा पर्व ।
जन्म गणेश पाख पितर , नवरात्र रखें सर्व ।।३।।
शरद पूर्णिमा मनाते , बाँटे - खायें खीर ।
पुण्य तीर्थ में नहाते , धोते पाप गभीर ।।४।।
धनतेरस - दीपावली , करें सब दीपदान ।
करें गोवर्धन - पूजा , रखें कृष्ण का मान ।।५।।
देवोत्थान एकादश , मनाते भक्ति- भाव ।
आँवला पूजा में सब , दिखलाते समभाव ।।६।।
अगहन मास में आये , जितने भी गुरुवार ।
महिला वर्ग लक्ष्मी को , पूजतीं बार - बार ।।७।।
मकरसंक्रान्ति मनाते , करें तीर्थ में स्नान ।
वस्त्र-गुड़-सोना-कम्बल , करते हैं तिल-दान ।।८।।
छेरछेरा पूनम को , घर - घर माँगें धान ।
शाकम्भरी माता का , जन्मवार यह जान ।।९।।
माघ शुक्ल पंचमी को , आता पर्व बसन्त ।
वीणापाणी जन्म लीं , देतीं ज्ञान अनंत ।।१०।।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी , शिवरात्रि सुखद वार ।
पूजा-भजन भक्त करें , शंभु को कर पुकार ।।११।।
होलिका-दहन भी सदा , आती फाल्गुन मास ।
सभी के मन में 'ठाकुर', भरती अति उल्लास ।।१२।।
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व्याख्या--छत्तीसगढ़ के बारह महीने में आनेवाले
अनेक व्रत-त्यौहार-पर्वपर्वाणी का यहाँ
वर्णन करने का प्रयास किया गया है ।
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