Friday, July 31, 2020

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से कवयित्री मीनाक्षी अवस्थी 'छाया' जी की कविता- मन की गिरह

मीनाक्षी अवस्थी 'छाया' 
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
विषय- मन की गिरह

गाँठ डोरी में रहने दें,इसे मन में न बँधने दें,
बड़ी तकलीफ होती है,गिरह जीने नहीं देती।
 उलझनें और हैं बढ़ती,कसम के दौर चलते हैं,
 कहीं न थाह निर्णय का,जिरह जीने नहीं देती।
हो कारण या अकारण ही,नजर में हो जरूरी है,
नजर से गिरनेवाली हो,वजह जीने नहीं देती।
 हमेशा शाँति की चाहत, रखे मन मेंं चला करते,
 ये अँतर गहरे पीढ़ी के,कलह जीने नहीं देती।
 जुबाँ तक आ नहीं पाते,हलक में पर,मचलते हैं,
 सम्हालें कैसे भावों को ,सतह जीने नहीं देती।
 हकीकत जानकर भी जो,बने अनजान रहते हैं,
  फर्क अपने ही अपनों में,न रह जीने नहीं देती।
 रखे ईमान की राहें, कपट,छल से सदा दूरी,
   कसौटी वक्त की भारी,कि वह जीने नहीं देती।
जमें रहना जरूरी है,दिलों में और खयालों में,
विलग करके, कलेजे को,विरह जीने नहीं देती।
 यकीं उनको नहीं है गर, मुहब्बत पाक है अपनी,
  नजर में खोट है खुद की, सुलह जीने नहीं देती।
  नजरिया ऊँचा रखिए और,जरा पाकीज़गी मन में,
   वरन् ये शक की 'छाया'की,फतह जीने नहीं देती।
             

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