नाम; डॉ गुरिंदर गिल
लाहड दातु, साबाह,
मलेशिया। { अभी इन दिल्ली }
करूँ और इनायत कैसी
मोहब्बत करने का मुझे सलीका न था
तुमने सीखा दिया करूँ शिकायत कैसी
जीने की तमन्ना न थी दुआओं ने दी
ज़िंदगी अब मरने की करूँ हिमाकत कैसी
माना हर एक तस्वीर के दो चेहरे होते है
एक में तारीकी दूसरे में उजाला रहते है
दरिया ए मोहब्बत में डूब जाने का है मन
तो मांगूं फिर मैं बचने की रिआयत कैसी
किताब ऐ जीस्त में एक पन्ना तुम्हारा है
इस में बातें अधूरी हैं तेरी है न कुछ हमारा है
मिलना बिछड़ना किस्मत की बात होती है
तुमने शायर बना दिया करूँ और इनायत कैसी
यह खुवाब है जिस की तामीर दुआओं में हो न सकेगी
जो हटा लफ़्ज़ों का नकाब तो ग़ज़ल हो न सकेगी
कौन लाया है कैसा मोड़ आया है इबादत ऐ इश्क़ में
वीरान है उजडी पड़ी है सपनों की जर्जर इमारत जैसी
मंदिर मस्जिद जाने का मेरा अपना एक सलीका है
दुआ होंठों पर नहीं दिल में रखने का आये तरीका है
चाहे मानो तुम ये मेरी कमज़ोरी है पर जरुरी है
दिल ओ जुबां के बीच फासला रखना है सियासत जैसी
जनून ऐ इश्क़ की इन्तहा है गरजता बरसता बादल
कुछ और नहीं आशिक के दिल की दुआ है बादल
ना उतावले हो खुद ही सुर्ख पत्ते टूटने को साख से
तो तूफ़ान ओ आंधियो तोड़ने की करेंगे हिमाकत कैसी
सरवरचित
डॉ गुरिंदर गिल
दिल्ली - 56
No comments:
Post a Comment