Monday, July 20, 2020

महासमुन्द से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- गेड़ी

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- चल संगी गेड़ी खपाबो।

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आगे अवांस सावन के,
डोली - खार मन भावन हे,
चल संगी फेर खेला जमाबो,
चल संगी गेड़ी खपाबो।
             टंगली लेके बिहनिया ले,
             मिल जुल के डोंगरी जाबो,
             लखरी ला के ददा करा जी,
             चल संगी गेड़ी खपाबो।
हवय हमर तैहा के खेला,
जग में एकर चलन बगराबो,
किसम किसम के फिता सजाबो,
चल संगी गेड़ी खपाबो।
             गांव के खोल मा जमो जोडियाबो,
            मिल जुल के दौड़ लगाबो,
            चढ़के उमा करतब देखाए बर,
           चल संगी गेड़ी खपाबो।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने हरेली त्यौहार में बनाए जाने वाले लकड़ी के गेड़ी का वर्णन करते हुए कहा है कि गांव में छोटे बच्चे बड़े उमंग से लकड़ी लाकर गेड़ी बनवाते हैं और फिर दौड़ लगाते हैं।

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