स्थान-दुर्ग(छ.ग.)
विधा-मुक्तक
शीर्षक- *कलम का सिपाही*
आधुनिक कहानी के जो पितामह कहलाये,
मूल नाम था उनका धनपत राय,नवाब राय,
वाराणसी के लमही गाँव में हुआ इनका जन्म
माता आनंदी देवी,पिता थे अजायबराय।
कहें उपन्यास सम्राट या महान विचारक,
आर्य समाज के थे ये प्रचारक,
अल्प आयु में मात-पिता का साथ छूटा,
साहित्य का मार्ग भी कहाँ सरल था,
शिक्षक बन करने लगे विद्या-दान,
साथ में स्वयं करते रहे अध्ययन,
बने शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर,
विधवा-विवाह का भी किया समर्थन,
बाल-विधवा शिवरानी से कर लिया गठबंधन।
देशभक्ति का जज्बा लेखन में दिखा,
जब सोज़े-वतन का प्रकाशन हुआ,
अंग्रेजों ने इस पर भी रोक लगा दी
कभी ना लिखने की फरमान सुना दी,
नाम अपना प्रेमचंद किया, लेखन फिर भी ना रुकने दिया।
पूस की रात हो या गोदान,बूढ़ी काकी हो या निर्मला,
गरीबों की पीड़ा या किसानों की समस्या,
दलित पर अत्याचार,नारी जीवन का दर्द
समाज के हर पहलू का दर्शाते थे मर्म ।
अंत समय में बिमारी ने यूं जकड़ा
"मंगलसूत्र","मानसरोवर तक साँसों ने साथ ना दिया
अधूरी रह गयी जो इनकी कहानी,
पुत्र अमृत ने पूरा किया ।
प्रगतिशील परंपरा के समर्थक, लोकप्रिय रचनाकार
इनके जैसा ना कोई कलम का सिपाही हुआ ।
......
wow besttttt
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