जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय- मुंशी प्रेमचंद
विधा-छंद मुक्त
शीर्षक- *साहित्य प्रेमी प्रेमचंद*
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काशी में जन्मे आज थे, साहित्य प्रेमी प्रेमचंद....
दुख दर्द आह के आगाज थे, साहित्य प्रेमी प्रेमचंद....
हीरा मोती और वरदान थे,
कफन,गबन और निर्मला, गोदान थे ।
गरीबी मुफलिसी सहज ही झेल लिया,
समाज में जीते रहे पर ज्ञान से अनजान थे ।।
कष्ट साध्य जीवन के मोहताज थे, साहित्य प्रेमी प्रेमचंद....
मानवता के वेद में नमाज थे, साहित्य प्रेमी प्रेमचंद....
सुप्त जागृति के आह्वान थे,
कहानी को कहानी के भगवान थे ।
जीवन के इस बगिया में,
दबे कुचले फूलों के कुसुमवान थे ।।
साहित्य के सरताज थे,साहित्य प्रेमी प्रेमचंद......
अत्याचार विरुद्ध तीरंदाज थे, साहित्य प्रेमी प्रेमचंद.....
वह पूस की रात और पंच परमेश्वर,
बूढ़ी काकी के रुदन में करुणा का स्वर ।
तरुणाई में करुणाई थी,
धन्य धन्य है सात सुरों में सप्तस्वर ।।
ताजमहल हो कहानी तो मुमताज थे,साहित्य प्रेमी प्रेमचंद....
बेबाकी अनूठा अंदाज थे, साहित्य प्रेमी प्रेमचंद....
रंगभूमि में कर्मभूमि की वही परीक्षा,
कायाकल्पित प्रतिज्ञा से मिलती शिक्षा ।
दीन दुखियों के साथ रहे,
दया से दुनिया देती थी उनको दीक्षा ।।
रोती बिलखती समाज के आवाज थे, साहित्य प्रेमी प्रेमचंद.....
चोटिल पंछी के कोई परवाज थे, साहित्य प्रेमी प्रेमचंद....
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
Nice
ReplyDeleteBahut sundar
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