गीतांजली वार्ष्णेय
बरेली,उ.प्रदेश
शीर्षक- एक युग प्रवर्तक प्रेमचंद
1880 साहित्य में था एक फूल खिला,
यथार्थ जीवी प्रेमचंद साहित्य जगत को एक नाम मिला,
नाम मिला एक नया मुकाम मिला।।
दिखा सके जो आईना समाज को, संसार को ऐसा एक जांबाज मिला।।
देख समाज की हींन दशा मन जिसका आहत हो चला,
शिक्षक बन शिक्षित किया,
लिख समाज का यथार्थ वाद
एक दिशा नई दे चला।।
लिख सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान उपन्यास समाज सुधार का कार्य किया।।
कफन, पूस की रात, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा कहानी ,आधुनिक समाज से जोड़ दिया।
उस दौर के समाजसुधार आंदोलनों, स्वाधीनता संग्राम तथा प्रगतिवादी आंदोलनों के सामाजिक प्रभावों का स्पष्टचित्रणहैकिया।
सशक्त विरोध उनके साहित्य में दहेज, अनमेल विवाह, पराधीनता, लगान, छूआछूत, जाति भेद, विधवा विवाह, आधुनिकता, स्त्री-पुरुष समानता,प्रमुख समस्याओं का चित्रण भी था किया।
आदर्श हैं मानवता के यथार्थवाद से रिश्ता जोड़ लिया।।
कफन लिख फिर कफ़न ओढ़ 1936 में देहावसान किया।।
युग स्तंभ 1918-1936 के काल खंड को 'प्रेमचंद युग' था नाम दिया।।
गीतांजली वार्ष्णेय
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