रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--दोहा
शीर्षक--'जगत में तीन रत्न सार'
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्न संज्ञा विधीयते ।।
--आचार्य चाणक्य { दोहानुवाद }
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निश्चय सारे जगत में , तीन रत्न हैं सार ।
कह गये पूर्वज अपने , करके सोच-विचार ।।१।।
प्रथम रत्न रहा जग में , जल दूर करे प्यास ।
सब प्राणी वनस्पति में , इसका रहा निवास ।।२।।
जिसके कारण खेत में , किसान करते चास ।
भोजन पकाते जल से , तब मिल पाता ग्रास ।।३।।
स्नान करने से लाता , कलेवर में निखार ।
इससे होती धुलाई , वस्त्र का परिष्कार ।।४।।
सारे विश्व में इसका , है अनेक उपयोग ।
इसके उचित सेवन से , मिट जाते हैं रोग ।।५।।
दूसरा रत्न अन्न है , सबका पोषणहार ।
अन्न में निवास करता , विवेक का भण्डार ।।६।।
सप्त धातु वर्द्धक रहा , जग में अन्न विशेष ।
भोजन ग्रहण करने से , होता हर्ष अशेष ।।७।।
तन-मन होता अन्न से , निश्चय ही बलवान ।
तृप्तिदायक यह होता , करता शक्ति प्रदान ।।८।।
तीसरा रत्न सुभाषित , मृदु वाणी अनमोल ।
श्रवण रन्द्र प्रविष्ट करे , रस देता नित घोल ।।९।।
मन का दुःख हर लेते , नम्र बोल रसदार ।
मीठी बोल को सुनके , वश होता संसार ।।१०।।
मधुर वाणी सुनने से , मन का मिटे विकार ।
सारे जीव खुश होते , वचन का चमत्कार ।।११।।
मूढ़ लोग किंतु कहते , अश्म खंड को रत्न ।
पाने को 'ठाकुर' उसे , करते खूब प्रयत्न ।।१२।।
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व्याख्या--दुनिया में जल , अन्न एवं अनमोल वचन
तीन रत्न हैं , पर मूर्ख लोग पत्थर-खण्ड
रत्न मानते हैं ।
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