Wednesday, July 22, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर'बंजारीवाले'की कविता:- जगत में तीन रत्न सार

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--दोहा
शीर्षक--'जगत में तीन रत्न सार'
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढैः  पाषाणखण्डेषु  रत्न  संज्ञा  विधीयते ।।
      --आचार्य चाणक्य { दोहानुवाद }
                      ०××××××०
निश्चय  सारे  जगत  में , तीन   रत्न  हैं  सार ।
कह  गये  पूर्वज अपने , करके सोच-विचार ।।१।।
प्रथम रत्न रहा जग में , जल दूर  करे  प्यास ।
सब प्राणी वनस्पति में , इसका रहा  निवास ।।२।।
जिसके कारण खेत में , किसान  करते चास ।
भोजन पकाते जल से , तब मिल पाता ग्रास ।।३।।
स्नान करने  से  लाता , कलेवर   में  निखार ।
इससे    होती   धुलाई , वस्त्र  का  परिष्कार ।।४।।
सारे  विश्व  में   इसका , है   अनेक  उपयोग ।
इसके उचित  सेवन से , मिट  जाते   हैं  रोग ।।५।।
दूसरा   रत्न   अन्न   है , सबका   पोषणहार ।
अन्न में  निवास करता , विवेक  का भण्डार ।।६।।
सप्त धातु  वर्द्धक रहा , जग  में अन्न विशेष ।
भोजन ग्रहण करने से , होता   हर्ष    अशेष ।।७।।
तन-मन होता अन्न से , निश्चय  ही  बलवान ।
तृप्तिदायक यह होता , करता  शक्ति  प्रदान ।।८।।
तीसरा रत्न सुभाषित , मृदु  वाणी अनमोल ।
श्रवण रन्द्र प्रविष्ट करे , रस  देता  नित घोल ।।९।।
मन का दुःख हर लेते , नम्र   बोल    रसदार ।
मीठी बोल को सुनके , वश   होता    संसार ।।१०।।
मधुर  वाणी  सुनने से , मन का मिटे विकार ।
सारे जीव  खुश  होते , वचन  का  चमत्कार ।।११।।
मूढ़ लोग  किंतु कहते , अश्म खंड  को रत्न ।
पाने  को 'ठाकुर' उसे , करते   खूब   प्रयत्न ।।१२।।
                     ०×××××××०
व्याख्या--दुनिया में जल , अन्न एवं अनमोल वचन 
             तीन रत्न हैं , पर मूर्ख लोग पत्थर-खण्ड
             रत्न मानते हैं ।

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