रचनाकार- मीरा आर्ची चौहान
जिला- कांकेर,छग
शीर्षक- ख्वाब
विधा-कविता (मुक्त छंद)
ख्वाब नहीं मेरी कि आसमां
छू जाऊं,
किसी ऊंचे ओहदे पर रह इतराऊं,
बलखाऊं।
ख्वाब बस इतना कि राह में
मिले कोई दुःखी
तो उसे उठा इतना जोश भर
सकूं कि वह,
बन सके मील का पत्थर राह बताने को।
ख्वाब नहीं मेरी कि बड़े बंगले में रहते हुए,
श्वान को दूध- रोटी खिलाएं और
उसे घुमाऊं,
मिलने को लोग करते रहें घंटों इंतजार,
बस इतनी ही इल्तजा रब से कि
काम आ सकूं,
उन बेबसों की जिनके मन में सपने तो हैं,
पर रास्ता ही पता नहीं किधर जाना है उसे।
हे ईश,दे दामन भर दे दर्द से मेरा
उनके हिस्से का,
जो सहकर दर्दनाक पीड़ा जीवन दान देते हैं।
ताकि लिख सकूं दर्द सहने का नुस्खा और
लोग पढ़ कर मेरी कविता बन जायें शहंशाह।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
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