संबलपुर,जिला-कांकेर,(छ. ग.)
शीर्षक-सावन
*सावन*
आया सावन
झूम-झूम के
तन-मन महकाएं
धरा को चूम-चूम के।
रिमझिम-रिमझिम
बरसे सावन,
पेड़ों में झूले पड़
गए मनभावन।
वसुधा हरी-भरी
प्रफुल्लित हुए आँगन,
प्रिय मिलन की आस बनी ,
कब आएंगे साजन।
खिल-खिल करते
मायके आई बिटिया,
सखियों संग मिल
करती अठखेलियाँ।
लगे खिलती कलियाँ
जैसी खुशियों के,
गीत गाएं डाले
सखियों संग गलबहियाँ।
सावन की घटाएं
बरखा संग आएं,
हरी-भरी धरती और
इंद्रधनुषी छटा सुहाएं।
बादलों के गर्जन-तर्जन
से जग डर जाएं,
दामिनी दमक,
इंद्रधनुष की चमक से इठलाएं।
सतरंगी रंगों से प्यासी
धरती की प्यास बुझाएं,
दादुर,मोर पपीहा,
कोयल सबकी त्रास मिटाएं।
धरती की सोंधी महक
सारे जग को सुहाएं,
बागों में यौवन छाया
देख सौंदर्य भी शर्माएं।
मनभावन,रस बरसावन
सावन पिय-सन्देशा लाएं,
सृष्टि का सारा वैभव
सावन के अंजूरी में समाएं।
आया सावन
झूम-झूम के,
तन-मन महकाएं
धरा को चूम-चूम के।
व्याख्या-उपरोक्त कविता में सावन माह में
रिमझिम वर्षा के पेड़ों पर झूले पड़ने का वर्णन है।इस माह में बेटियाँ मायके आकर सहेलियों से प्रसन्नता से मिलती है।धरती हरी -भरी हो गई है।बादलों की गर्जना संग इंद्रधनुष की चमक दिखाई पड़ रही है।विरहन को पिय मिलन की आस है।दादुर,मोर,पपीहा, कोयल की त्रास मिटाने वर्षा ऋतु आई है।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,( छ. ग.)
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