देवयानी शुक्ला
02. जिला :- रायपुर (छ.ग.)
03. छंद :- मुक्तक
04. रचना का शीर्षक :-
*रचनांकुर*
मैं अपने ही विचारों की खाद में पड़ा हुआ एक बीज हूँ
स्याही से तर कागज़ पर
क़लम की कलम लगाती हूँ
फूटा है एक अंकुर
सृजन का ,मुझसे ही
वो कुछ भी हो सकता था
कोई छोटी सी त्रिवेणी या लंबा सा मुक्तक
नन्हा सा हाइकु या कोई रुबाई
कोई गीत या कोई गज़ल
जब बिरवा बढ़ता है
तब पता चलता है
कि
पौध कौन सी है ?
नस्ल कैसी है ?
फूल कौन से खिलेंगे ?
फल कैसे आएंगे ?
बचपन में तो सारी कोंपलें
एक जैसी ही दिखाई देती हैं ,
सारी रचनाएँ तो
ऐसे ही जन्म लेती हैं ।
देखा जाए , तो....
हर कवि अपनी कविताओं का
बीज होता है ।
वह स्वयं ही स्वयं को स्वयं के भीतर बोता है ...
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