देवयानी शुक्ला
02. जिला :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
03. छंद :- मुक्तक
04. रचना का शीर्षक :- *क़लम का सिपाही*
सारे सुधीजन जब
तिलिस्मी स्वप्नों में खोए हुए थे
और रेशमी कल्पनाओं की
गोद में सोए हुए थे
एक छोटी-सी तूती बज उठी
लमही के इक छोर से
सत्य-भानु उदित हुआ तब
पूरब की ओर से
लीक थी श्रृंगार की
उसको दरकिनार किया
चलन था रोमांच का
उसे अस्वीकार किया
सहमे हुए सत्य को
गोद में उठा लिया
जीवन के पात्र से
पात्रों का चयन किया
हिंदी और उर्दू की
सलाइयों में फांदकर
कितनी कहानियाँ बुनी
सुखों दु:खों में बांधकर
शोषित की वेदना लिखी
दमितों के रोष भी
पंचों का न्याय भी लिखा
हामीद का संतोष भी
पतलून मात खा गई
ग़रीबी की लंगोट से
शत्रु भी सिहर उठा
सोज़ ए वतन की चोट से
पर मौन न हुई क़लम
साधना ना बंद की
*धनपत* ने तब रखी
नींव *प्रेमचंद* की
दु:ख की रोशनाई से
मर्म वो गढ़ता रहा
क़लम का सिपाही सदा
बिना थके लड़ता रहा
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