जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- कलम के सिपाही
विधा-कविता (मुक्त छंद)
कलम के महान वो सिपाही थे।
साहित्य के चमकते सितारे थे।
उपन्यास सम्राट की उपाधि पाई,
कहानीकारों में सबके दुलारे थे।
पूस की रात हो या हो बूढ़ी काकी,
नमक के दरोग़ा के इंतहान बाकी।
कर्त्तव्य निष्ठा हो या हो इमानदारी
प्रेमचंद ने निभाई सब जिम्मेदारी
नारी की पीड़ा और गरीबी का दर्द
गोदान में उकेरा अभावों में कर्ज।
बूढ़ी काकी,पंच परमेश्वर, परीक्षा,
विधवा भी जिए उनकी थी इच्छा।
हिन्दी हो या उर्दू लेखन बेमिसाल
मानसरोवर से उनकी है पहचान।
जन्मदिन पर उन्हें शत् शत् नमन,
श्रृद्धा के पुष्प अर्पित करे चमन।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
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