गजेन्द्र हरिहारनो " दीप "
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सदियों गुज़ार रहे हैं
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हर पल , हर क्षण अब सदियों जैसा,
लगता है जैसे सदियाँ गुज़ार रहे हैं
न जाने ये कैसी हवा चली है ?
ज़िन्दगी जैसे थम - सी गई है
जीना बड़ा मुहाल हो चला
हर एक शख़्श बदहाल हो चला
आसमान की ओर तकती निगाहें
थक-सी गई अब सबकी बाहें
दिल के अंदर अगन लगी है
ख़तरे में हर जान पड़ी है
संकट का ये कैसा दौर है आया
दूर हो रहा हर एक साया
एक एक पल सदियों- सा लागे
जाने अब क्या होगा आगे ?
यक्ष प्रश्न है सबके आगे
चलो चलें सब उत्तर ढूँढें
सदियों वाले भ्रम को त्यागें
विश्वास का सूरज सभी उगाएँ
हर मुश्किल का करें सामना
कभी न इससे है घबराना
मिल कर सबका हाथ थामना
" दीप " की बस यही इल्तिज़ा
नीति-नियम का सब करें पालना
हर लम्हें को हँस के बिताना .….
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🙏🙏
गजेन्द्र हरिहारनो "दीप "
डोंगरगाँव, जिला- राजनांदगाँव(छत्तीसगढ़)
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( रचना सर्वथा मौलिक है )
Very nice sir ji
ReplyDeleteबहुत सुंदर हरिहारनो सर जी
ReplyDeleteबहुत सुंदर आदरणीय 👍
ReplyDeleteआप सभी सुधिजनों को हृदय से साधुवाद 🙏🙏
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