स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'अमर शहीद वीर नारायण सिंह'
छत्तीसगढ़ की वीर माटी , कहते सोनाखान ।
जनमें वीरनारायण सिंह , रहे योद्धा महान ।।
देश प्रेम के मूरत बनके , गोरों से ली ठान ,
कृषिकर से सारे दुःखी थे , भूमि सपूत किसान ।
अंग्रेज वसूल करने लगे , वृद्धि दर में लगान ।।१
सन् अट्ठारह सौ छप्पन है , रहा कष्ट का काल ,
बरसे नहीं घटा धरती में , पड़ा भारी अकाल ।
त्राहि-त्राहि मचा था क्षेत्र में , लोग थे परेशान ।।२
सहे नहीं लोगों की पीड़ा , नारायण रणधीर ,
अन्न ऋण में माँगने पहुँचे , माखन बनिया तीर ।
मना करनेपर लूट बाँटे , भरा भण्डार धान ।।३
सुना स्मिथ दुष्ट धावा बोला , सैन्य शक्ति के साथ ,
वीर नारायण सिंह से है , करने दो दो हाथ ।
काली घटा घमंड घटा सा , बरस रहे थे बान ।।४
नीचता दिखाई स्मिथ पापी , खूब विश्वासघात ,
बन्दी हुए नारायण सिंह , भारी दुःखद बात ।
वीर सपूत सोनाखान के , दिये प्रथम बलिदान ।।५
फाँसी दिये अंग्रेज उनको , अमर हो गया नाम ,
वीरवर नारायण सिंह को , मेरा कोटि प्रणाम ।
अमर सपूत 'ठाकुर' देश के , करें सभी गुणगान ।।६
०××××××०
व्याख्या--छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
शहीद वीर नारायण सिंह के देश के प्रति
बलिदान का संक्षिप्त वर्णन है । पद क्रमांक
४ में-- दो दो हाथ = दो हाथ , लड़ना तथा
काली घटा= काले बादल , बरसते बादल
श्लेष अलंकार है ।
No comments:
Post a Comment