Thursday, July 2, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- अमर शहीद वीर नारायण सिंह

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'अमर शहीद वीर नारायण सिंह'
छत्तीसगढ़  की   वीर  माटी , कहते     सोनाखान ।
जनमें   वीरनारायण    सिंह , रहे    योद्धा   महान ।।
देश  प्रेम  के   मूरत   बनके , गोरों   से   ली  ठान ,
कृषिकर से  सारे  दुःखी  थे , भूमि  सपूत किसान ।
अंग्रेज   वसूल   करने   लगे , वृद्धि  दर में  लगान ।।१
सन्  अट्ठारह  सौ  छप्पन है , रहा  कष्ट  का काल ,
बरसे  नहीं   घटा  धरती  में , पड़ा  भारी  अकाल ।
त्राहि-त्राहि  मचा था क्षेत्र में , लोग    थे    परेशान ।।२
सहे  नहीं  लोगों  की  पीड़ा , नारायण     रणधीर ,
अन्न  ऋण  में  माँगने पहुँचे , माखन  बनिया तीर ।
मना    करनेपर   लूट   बाँटे , भरा   भण्डार  धान ।।३
सुना स्मिथ दुष्ट  धावा बोला , सैन्य शक्ति के साथ ,
वीर   नारायण  सिंह  से   है , करने  दो   दो  हाथ ।
काली  घटा  घमंड  घटा सा , बरस  रहे   थे  बान ।।४
नीचता दिखाई  स्मिथ पापी , खूब     विश्वासघात ,
बन्दी    हुए   नारायण  सिंह , भारी  दुःखद   बात ।
वीर   सपूत   सोनाखान  के , दिये प्रथम बलिदान ।।५
फाँसी   दिये  अंग्रेज  उनको , अमर हो  गया नाम ,
वीरवर   नारायण  सिंह  को , मेरा   कोटि  प्रणाम ।
अमर  सपूत 'ठाकुर' देश के , करें  सभी   गुणगान ।।६
                           ०××××××०
व्याख्या--छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
              शहीद वीर नारायण सिंह के देश के प्रति
              बलिदान का संक्षिप्त वर्णन है । पद क्रमांक
              ४ में-- दो दो हाथ = दो हाथ , लड़ना तथा
              काली घटा= काले बादल , बरसते बादल
              श्लेष अलंकार है ।

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