कवियित्री- श्रीमती गायत्री ठाकुर "सक्षम"
जिला -नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश)
शीर्षक -आलोचना
*आलोचना*
जिंदगी में कभी न कभी इंसान को,
सहना ही पड़ती है आलोचना।
बुरी लगती हैआलोचना इंसान को,
पर बुरी होती नहीं हैआलोचना।
आलोचना से सुधार होता है इंसान का।
खात्मा करती वह इंसान के विकार का।
आलोचना से व्यक्तित्व में निखार आता है।
परिष्कृत होकर प्रशंसा योग्य बन जाता है।
रत्नावली ने की आलोचना तुलसीदास की।
फलतःतुलसीदास ने की रचना रामचरितमानस की।
विद्योत्तमा ने सुधार दिया था कालिदास को।
डाल पर बैठ उसी को काटने वाले मूर्ख को।
आलोचना है जरूरी उज्जवल भविष्य के लिए।
विकृतियों को निकालकर निर्मलता लाने के लिए।
साबुन के जैसे साफ कर देती है आलोचना,
कृति को विकृति रहित कर देती है आलोचना।
श्रीमती गायत्री ठाकुर "सक्षम"
Nice poetry
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