Wednesday, July 29, 2020

बस्तर छत्तीसगढ़ से कवि विश्वनाथ देवांगन"मुस्कुराता बस्तर" जी की कविता- मत बहाओ,तुम घड़ियाली आंसू

कवि : विश्वनाथ देवांगन'मुस्कुराता बस्तर'
बस्तर छत्तीसगढ़
शीर्षक : मत बहाओ,तुम घड़ियाली आंसू

मेरे पैर हैं लौह मजबूत,
मैं हूं कर्मयोद्धा श्रम देवदूत,
धरा का स्वेद सच्चा सपूत,
तुम फोकट का,,, 
न करो उछल कूद,
मैं अब भी,चल रहा हूं धांसू,
मत बहाओ,तुम घड़ियाली आंसू |

जब मैं तेरे घर पर,
भीगकर काम कर रही,
मेरे भीगते बदन देख,
डायरी में मस्त लिख रहा,
मेरी तकलीफ,,,
नहीं दिखी तुझको,
स्वप्न आलिंगन में व्यस्त रहा,
आज क्यों,,,
फिर अचानक,,,
जाग गया है,तेरा वजूद,
तुम कलमकार हो,या टोना जादू,
मत बहाओ,तुम घड़ियाली आंसू |

मर रहा था मैं,,,
तुम फोटो मस्त खींच रहे,
एसी कमरों में बैठे,
डिबेटों में तुम बिक गये,
नीरा पोंगा हो ताबड़तोड़,
राई का पहाड़ लिख रहे,
मेरा दर जा रहा मैं,
तुम फिर भी,,,
करोड़ो में मुझे,
चलते हुए बिक गये,
हमदर्द तुम हो सच मे,
फिर क्यों,,,
नहीं दिखते सतह-नस में,
कहां मर जाती हैं,
तुम्हारा जमीर उर-अंतस में,
हो जाती कहां-क्यों उड़न छू,
मत बहाओ,तुम घड़ियाली आंसू |

मैं शिव का तांडव हूं,
मैं श्रम का अर्गला स्रोत हूं,
मैं गंगाजल सा पावन,
अविरल अखंड ज्योत हूं,
मेरा मजहब श्रम है,
जगोत्थान मेरा धर्म है,
मैं घर जा रही हूं,
हां,मैं भी दर जा रहा हूं,
इश्क लड़ाना,,,,
अब तुम नौकरानी से,
फिर,,कलम चलाना 
मेरे पैर के छालों के पानी से,
तुम मेरे मुरीद नहीं,
मैं दीवाली या ईद नहीं,
कब तक,,,,तुम सब,
छोड़ दोगे,
विकास के लिये मुझे,
प्लीज मत बनो,
तुम भी मेरा पिछलग्गू,
मत बहाओ,तुम घड़ियाली आंसू |

विश्वनाथ देवांगन'मुस्कुराता बस्तर'

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