_देवयानी शुक्ला_
02. जिला :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
03. छंद :- मुक्तक
04. रचना का शीर्षक :-
*सार्थक ज्ञान*
जीवन की राह में
ज्ञान और अज्ञान राहगीर हैं ।
अज्ञान के सैकड़ों आडंबर
ज्ञान मूक मगन फ़कीर है ।
एक छोर पर ज्ञान होता है ,
दूसरे पर अज्ञान रहता है ।
ज्ञान में गरिमा होती है ,
अज्ञान को अभिमान रहता है ।
ज्ञान को ज्ञात होता है ;
कितना कुछ अभी अज्ञात है ।
अज्ञान को ये भ्रम रहता है
कि वह हर क्षेत्र में निष्णात है ।
अज्ञान की आधी गागर बिना कारण छलकती है ।
ज्ञान की गगरी भरी होकर भी
मौन सदा ही रहती है ।
जब अज्ञान की मूढ़ता
तर्कसंगतता को पस्त करती है ,
तब ज्ञान की धवल ज्योति ही अज्ञान के कालिख भरे दुर्ग को ध्वस्त करती है ।
ज्ञान असीम अनंत अनश्वर है ;
ईश्वर का पार्थिव हस्ताक्षर है ।
किंतु अज्ञान जटिलतर है ;
इसे जानना कहीं अधिक दुश्कर है ।
अज्ञान को जान लेना
जान लेने का पहला सोपान है ।
अज्ञानता से निरंतर संघर्ष ही
वास्तव में सच्चा सार्थक ज्ञान है ।।
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wow mami best❤️
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