लैलूंगा ,जिला-रायगढ़
विधा-मुक्त छंद (किसानों पर कविता)
शीर्षक- अन्नदाता
धरती तेरी माता
पिता तेरा विधाता
पर तेरे हिस्से सदा
दुख ही क्यों आता
हे मेरे अन्नदाता
कभी ऋणों के बोझ तले
तो कभी बाढ़ और सूखे से
हर बार कमर तोड़ा जाता
और आत्महत्या को मजबूर
मेरे देश के अन्नदाता
मौसम की मार को झेलता
हर परिस्थिति में मुस्कुराता
छोटी-छोटी खुशियां ही
उसके परिवार के हिस्से आता
बेटी के विवाह की चिंता
उम्र भर उसे सताता
चैन की नींद वह
कभी न सो पाता
मेरे देश के अन्नदाता
जिसकी कारण चूल्हा
जलता हर घर में
खुद दो वक्त की
रोटी भी न जुगाड़ पाता
मजबूर वह बच्चों को
भूखे पेट सुलाता
रोटी ,कपड़ा और मकान
उसके हिस्से ना आता
मेरे देश के अन्नदाता
खोखली हंसी चेहरे पे ला
हल,बैलों को लेकर वो देखो
रोज सुबह खेतों पर जाता
मेरे देश के अन्नदाता।
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