जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय-निर्वेद प्रधान रचना
विधा-छंद मुक्त
शीर्षक-"जीवन की व्यथा"
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चुपके से वो धरा में आया था,
संग खुशियों का अंबार लाया था।
मॉं का लाड़ला हंसता-खेलता,
किस्मत से जन्नत सा परिवार पाया था ।।
बड़े गौर से खुद को निहारता,
जरा हॅंसी संग आंखों को नमाया था ।
इस कॉंच के आईने में कोई तो छुपा है,
कमब़ख्त खुद ही खुद में एक टकटकी सा दिखाया था ।।
सपूत जीवन की कमाई खूब कमाया था,
रह-रहकर उठती संवेदना आंखों से बहाया था ।
नजरें नहीं मिलती अपनों से,
कैसे कहूं इन्हीं गलियों में हॅंसता मेरा साया था ।।
बचपन खुशियों के पालने में था,
जवानी अरमानों को घालने में था ।
कर्तव्यों का बोझ-बोझ बन गया,
अब वक्त भी घुटन के सांचे ढालने में था ।।
निकले थे दुनिया जीतने का जोश लिए,
लौटे जख्मों में जख्मों का दोष लिए ।
गुरुरियत हमारी खाक में मिल गई,
मातम पसरा हारे हैं अपना उद्घोष लिए ।।
पापा ने कभी माथा चूम लिया था,
देखकर मॉं ने मस्त झूम लिया था ।
भाई बहन के लफ्जों में जिक्र था,
हॉं तिरस्कार के शब्दों का आज हजूम लिया था ।।
अब नजरें मिलती नहीं अपनों से,
खुद को दूर कर लिया सारे सपनों से ।
मझदार से लौट आओ तुम भी माझी!!
समंदर गहरे हैं ये तुम्हारे सारे कल्पनाओं से ।।
समय बार-बार मौका नहीं देती,
घुटन में घुॅंटती ये सांस लेने नहीं देती ।
क्यों मोहब्बत के दलदल में फॅंसना है,
यह दलदल है जनाब! तिनके को तिनके का सहारा नहीं देती ।।
आंसू आसमॉं के बादलों सी बरसात होगी,
यह अंत: में तड़ित आघात होगी ।
दोहराई गलतियां इतिहास नहीं बुनतीं,
नादॉं संभल जाओ वर्ना दधीचि वज्रपात होगी ।।
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
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