जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा- आलेख
शीर्षक-"स्कूल के वो दिन"
*************************
स्कूल के वो दिन जब छुट्टियों को तरसा करते थे, स्नेह मित्रता परवरिश डांट और दुत्कार सब का सम्मिश्रण सहज ही बरसा करते थे । गांव में शिक्षा की उच्चतम स्तर नहीं थी, लगभग 2 किलोमीटर दूर आदर्श ग्राम भारती एकमात्र प्राइवेट स्कूल हुआ करती थी। एक मध्यमवर्गीय परिवार जब दो वक्त की आजीविका संसाधन ही बड़ी मशक्कत से जुटा पाती हो, तो प्राइवेट स्कूलों में दाखिला एक लोहे के चने चबाने के समान था। आजकल के स्कूलों में 3 साल की उम्र में के.जी.वन कक्षा शुरू हो जाती है, जब हम पढ़ाई का सिर्फ "प" ही बोल पाते थे । गली चौराहों के सभी घुमंतू यायावर व्यक्तित्व के दोस्तों से अच्छी खासी मित्रता थी, अपशब्दों का प्रयोग तो मुंह खोलते ही सहज ही टपक पड़ता था । लाडला होने के कारण दादा-दादी की प्यार का खूब लुत्फ उठाते थे। किसी को मार पीट कर रोज आते थे, तो कभी मार खाकर बेतुका बेवजह व्यर्थ की शिकायत कर देते थे । हमारे सरकारी स्कूल में कक्षा चौथी तक कोई परीक्षा नहीं होती थी। अगली कक्षा के लिए हमेशा अ से ज्ञ तक ही बोलना होता था या माता-पिता को आकर गुरुजी के सम्मुख गिड़गिड़ाना पड़ता था । फिर बाईं हाथ से सिर के ऊपर से होते हुए दाहिने कान का सिरा छूने पर उम्र की पैमाइश होती थी । दाहिने कंधे पर मटमैला एक सफेद झोला जिसका रंग अब सफेद से धूसर सा दिखने लगा था, टंगा होता था। बस्ते में ज्यादा कुछ नहीं बस दो-चार पेंसिल और एक स्लेट परम आवश्यक मध्यान भोजन का वह थाली होता था, जिसके लिए आधे से अधिक बच्चे स्कूल आते थे। स्कूल के प्रांगण पर "स्कूल जाबो पढ़ के आबो"को किसी ने "स्कूल जाबो खा के आबो" लिख रखा था। स्कूल के केवल दो शिक्षकों को हम छोटे गुरु जी और बड़े गुरु जी के नाम से जानते थे । हर रविवार का विशेषत: इंतजार होता था, गांव की गोंटिया पटेल जी के सभी महुआ के पेड़ों से महुआ के फूल बिनने वाले अच्छे छात्र ही एक कंडिका में अपना नाम दर्ज करा पाते थे, जिनको मेहनताना के रूप में रविवार का दिन शक्तिमान सीरियल देखने के लिए आगे की पंक्ति मिलती थी। वहां भी शिक्षकों की औचक निरीक्षण होता था ।
आज उसी डॉक्टर जैकाल का विशेष प्रयोग शक्तिमान सीरियल में होने वाला था, शनिवार रात से ही इसकी अभिकल्पना मन में तैयार हो रही थी, घर में नौकरों की कमी से पिताजी के साथ खेत पर मुझे जाना था । मैं सुबह से ही आगे की पंक्ति पर अपना डेरा जमाए रखा था, मम्मी जी के खूब डांटने पर कसमसाते हुए, खीझ कर मुझे जाना पड़ा। गुस्सा और क्रोध से आगबबूला होता हुआ बिना किसी से बात किए मैं हंसिए से एक ही बार में चार मेड़ की अरहर के पेड़ काट डाला । सारा गुस्सा हाथ में फफोले के रूप में उभर आया, और उससे लहू की रक्तिम रंग निखर आया । ममतामई मां यह देख रही थी पिताजी को आग्रह करने पर मेरे हाथों को देखकर मुझे आजाद करने को रो रो कर बोलने लगी और अंततः पिताजी राजी हो गए परंतु जाते जाते उनकी एक बात जेहन में बार-बार डंक मारने लगी, कि तुम लोग जीवन में कभी मेहनत का काम नहीं कर पाओगे, जो कर सकते हो उसी पर ध्यान दो इसलिए बार-बार कहता हूं कि मैं नहीं पढ़ पाया इसलिए मेहनत कर रहा हूं। तुम लोग पढ़ सकते हो इसलिए पढ़ो, फिर ऐसा मेहनत नहीं करना पड़ेगा ।
आज जब भी यह बात स्मरण में आती है सारा परिवार सुनकर खूब हंसने लगता है ।
आजकल के इस भाग दौड़ में गुरु शिष्य की परंपरा विलुप्ति की कगार पर खड़ी है, बच्चे सुबह से लेकर शाम तक ट्यूशन में व्यस्त हैं, बोर्ड परीक्षा के परिणाम सत प्रतिशत आने लगे हैं। बच्चों की व्यस्तता कहीं उनके गुस्सा को सुगमम दिशा दे पाएगी नहीं इस पर संशय होता है।
*************************
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
No comments:
Post a Comment